रविवार, 21 अक्टूबर 2018

तुम्हारे लिए ही जो सांस लेता है।

तुम्हारे लिए ही जो सांस लेता है।
उसी मुहब्बत का हिसाब लेता है।।

नाहक ना परेशान कर उसे
जो तुम्हें मीठे ख्वाब देता है।

गुणा-भाग से परे होती हैं कुछ बातें
वक्त ही इनका हिसाब देता है।

मुश्किलों को करता है जो आसान
उसी का तू जवाब लेता है।

तुम्हारे लिए ही जो सांस लेता है।
उसी मुहब्बत का हिसाब लेता है।।

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

आतिशबाजी क्यों दिखाती है इस दिवाने को।
एक तुम ही काफी हो दिलों में आग लगाने को।।
बड़ी कातिलाना है तेरी हंसी,
मुस्करा के ही बरबाद कर जाओगी जमाने को।।
कौन बच पाया सोख अदाओं के जादू से,
हर निगाहें आतुर हैं दिल में तेरे समाने को।।
सुन दिल जलाने वाले,
तुम्हें ही आना होगा मरहम लगाने को।।

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

जिसके लिए मैं सारी दुनिया से टकरा गया।

जिसके लिए मैं सारी दुनिया से टकरा गया।
उसे दुश्मनों की कतार में पाकर चकरा गया।

अभी तक पीठ पीछे करता रहा  वार वह,
आखिर आज सामने से पकड़ा गया।

बता देते तो हम यूं ही हार मान लेते,
नाहक वह बारूद बिखरा गया।

बहुत कच्चा था मैं दुनियादारी में,
उसका साथ मेरा तजुर्बा निखरा गया।

जतन से सहेजे थे हमने रिश्तों के मोती,
एक झटके में ही वह सब बिखरा गया।
जिसके लिए मैं सारी दुनिया से टकरा गया।
उसे दुश्मनों की कतार में पाकर चकरा गया।

                - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

सलवा जुड़ूम

मई 2005 में कुटरू-फरसेगढ़ से एक जन आंदोलन शुरू हुआ जिसे सलवा जुड़ूम नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम का अर्थ है शांति के लिए संगठन या शांति के लिए युद्ध।पहली नजर में यह नक्सलियों के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों का सशस्त्र युद्ध था।तीर-कमान,कुल्हाड़ी आदि से लैस ये आदिवासी नक्सलियों तथा उनके समर्थकों के सफाये में लग गए।बस्तर के आदिवासियों ने वहाँ की या अपनी सुरक्षा स्वयं अपने हाथ में ले लिया।वे बस्तर के चप्पे चप्पे में लोगों और सामानों की आवाजाही पर नजर रखने लगे।बस्तर के आदिवासी खुदमुख्तार होने लगे थे। 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने महान स्थानीय लड़ाका गुंडाधूर के नेतृत्व में अँगरेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था।जिसे भूमकाल नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम अपने सही अंजाम पर पहुँचता तो भूमकाल से भी महान होता।
                     तमाम कमियों,अभावों और कष्टों के बावजूद सलवा जुड़ूम सफलता की ओर अग्रसर था।दरअसल बस्तर में अब तक जो भी बाहरी लोग आए ,लगभग सभी ने आदिवासियों की सरलता का गलत फायदा उठाया।चाहे वे अँगरेज हो या मराठी बंजारे,चाहे बांग्लादेशी शरणार्थी हों,चाहे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हों या चाहे भारत के अन्य भागों में अपराध करके बस्तर के बीहड़ जंगलों में छिपे पापी और चाहे नक्सली ही हों।सबने बस्तर और बस्तरिहों को दोनों हाथों से लूटा। सबने उनकी सिधाई का लाभ उठाया।
                 सलवा जुड़ूम के समय भी बस्तर के आदिवासी छले गए।सबसे पहले महेन्द्र कर्मा ने सलवा जुड़ूम को अपने हाथों में लिया।बस्तर में उनकी अगुवाई या सहभागिता के बिना कोई जन आंदोलन हो उन्हें कैसे मंजूर होता।सोढ़ी देवा नामक काल्पनिक व्यक्ति को सलवा जुड़ूम का सुप्रीम कमांडर बताया।यदि कोई वास्तविक व्यक्ति जुड़ूम का कमांडर इन चीफ होता तो बस्तर के नेताओं की वाट लग जाती।तुरंत आनन फानन में पक्ष विपक्ष एक होकर सलवा जुड़ूम जैसे जन आंदोलन को हथिया लिया।अब जुड़ूम राजनेताओं की दया,शासन की नीतियों और कोर्ट के निर्णयों पर निर्भर कर दिया गया।एक बहुत बड़े जन आंदोलन की धार को असर दिखाने से पहले ही कुंद कर दिया गया।फिर न्यायालय का निर्णय आया कि आम जनता के किसी भी भाग का सशस्त्रीकरण नहीं किया जा सकता।इस तरह जुड़ूम को समाप्त कर दिया गया।आज बस्तर की जनता 2005से भी बदतर हालात में है।