गीत लिखूं मैं कैसे तुम्हारे इकबाल का?
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।
हां मैं अदना-सा इन्सान हूं;
पर कलम में समाया हुआ तूफान हूं।।
एहसास दिलाना बाकी है दिल में छुपे सैलाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।
हर तरफ अशांति है फिर अमन के गीत कैसे गाऊं ?
मैं तो ठहरा सतह का आदमी शिखरों को कैसे गले लगाऊं ?
अनगिनत सवालों का पुलिंदा मैं, इंतजार है जवाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।
मुझको तेरा कुछ भी नहीं भाता है।
जन-जन से मेरा नाता है।
तारीफ में एक लफ्ज़ नहीं निकलेगा
मैं तो एक पन्ना हूं बगावत की किताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।
सबकी उम्मीदें तार-तार है।
जनता आज जार-जार है।
बागी हुई कलम मेरी, काम नहीं करेगी तुम्हारी ढाल का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।
अपनी शानो-शौकत में होकर तुम मशगूल।
लोगों को समझते हो चरणों की धूल।।
कम नहीं आंकना जुगनुओं को
साथ चमकेंगे तो उजाला होगा आफताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।
- किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
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