शनिवार, 22 सितंबर 2018

कलमकार हूं इंकलाब का

गीत लिखूं मैं कैसे तुम्हारे इकबाल का?
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

हां मैं अदना-सा इन्सान हूं;
पर कलम में समाया हुआ तूफान हूं।।
एहसास दिलाना बाकी है दिल में छुपे सैलाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

हर तरफ अशांति है फिर अमन के गीत कैसे गाऊं ?
मैं तो ठहरा सतह का आदमी शिखरों को कैसे गले लगाऊं ‌?
अनगिनत सवालों का पुलिंदा मैं, इंतजार है जवाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

मुझको तेरा कुछ भी नहीं भाता है।
जन-जन से मेरा नाता है।
तारीफ में एक लफ्ज़ नहीं निकलेगा
मैं तो एक पन्ना हूं बगावत की किताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।

सबकी उम्मीदें तार-तार है।
जनता आज जार-जार है।
बागी हुई कलम मेरी, काम नहीं करेगी तुम्हारी ढाल का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

अपनी शानो-शौकत में होकर तुम मशगूल।
लोगों को समझते हो चरणों की धूल।।
कम नहीं आंकना जुगनुओं को
साथ चमकेंगे तो उजाला होगा आफताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

          - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

रविवार, 16 सितंबर 2018

जब से आया है तेरा पैगाम।


जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।
दिन-रात तुम्हें याद करना
इसका बस एक काम।

मन मचलता है
पास तुम्हारे आने को।
दिल है बेकरार
हर खतरा उठाने को।।
भाता नहीं है मुझे
तेरे शिवा कोई नाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।।

खींचा चला आता हूं
तेरी ही ओर।
तू ही है
मेरी चाहत की छोर।।
तुझे पाने की जिद में
भूल जाता हूं अंजाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।।

जब तुमसे बात हुई।
हसीन मुलाकात हुई ।
दिल की जमीं पर
खुशियों की बरसात हुई।।
दिन मेरे उजले हुए
सुहानी हो गई हर शाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।
दिन-रात तुम्हें याद करना
इसका बस एक काम।।

                - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

शनिवार, 15 सितंबर 2018

हमारी दोस्ती में

हमारी दोस्ती में कुछ लोग बड़े काबिल हो गये।
वे रहम दिल और हम रहम के काबिल हो गये।।

जिनकी आंखों से पोंछे थे हमने आंसू कभी,
वे अब हमीं पर हंसने वालों में शामिल हो गए।

पता ही नहीं चला कि कब लूट लिये गये,
हम दोस्ती में इस कदर गाफिल हो गये।

जिन नाउम्मीदों को हमने दिया पनाह,
आज  वो  ही  हमारे  कातिल  हो  गये।

हमारे जिन लफ़्ज़ों की शान से करते थे नकल,
वे भी उनकी नज़र में अब बातिल हो गये।

(बातिल=व्यर्थ)

हमारी दोस्ती में कुछ लोग बड़े काबिल हो गये।
वे रहम दिल और हम रहम के काबिल हो गये।।

                  - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

जो जीता है तुम्हारे लिए

जो जीता है तुम्हारे लिए उसी की जान लेते हो।
सबको अपने जैसा खुदगर्ज क्यों मान लेते हो?

मुहब्बत से ही लूट लोगे सारी दुनिया,
हर किसी से दुश्मनी क्यों ठान लेते हो?

प्यार-मुहब्बत भी कोई चीज होती है यार,
होशियारी को ही सब कुछ क्यों मान लेते हो?

सहज सरल हैं तुम्हारे सभी अपने लोग,
चालाकी और बांकपन का कहां से ज्ञान लेते हो?

हर दिल ने समेट रखा है दर्द का समंदर
उसे खुशियों का सैलाब क्यों मान लेते हो?

जो जीता है तुम्हारे लिए उसी की जान लेते हो।
सबको अपने जैसा खुदगर्ज क्यों मान लेते हो?

                     -किशोरीलाल वर्मा 'कुंदन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित

चुप रहना ही समझदारी का पैमाना हो गया

चुप रहना ही समझदारी का पैमाना हो गया है।
ठहाका   लगाए  मुझे   जमाना हो  गया है।।

न रहीं अब खुशियों से भरी नादानियां,
वक्त से पहले  यह बंदा सयाना हो गया है।

अब दिल की कहां सुनता है दिमाग,
यह भी हमसे बेगाना हो गया है।

जिम्मेदारियों का बढ़ गया है बोझ इतना
कि मुश्किल कदम बढ़ाना हो गया है।

हकीकत बयां करना अब ऐब हो गया,
झूठ और फरेब का जमाना हो गया है।

चुप रहना ही समझदारी का पैमाना हो गया है।
ठहाका   लगाए  मुझे   जमाना हो  गया है।।

              - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

दर्द अपना कह दे

दर्द अपना कह दे मुझे,
बढ़ता है अकेले रोने से।
बांटने से कम होगा बोझ,
थक जाएगा अकेले ढोने से।।

उदास रहना अच्छा नहीं,
कोई खुश होता है तेरे खुश होने से।

सुख-चैन है दिल की असली पूंजी
फर्क नहीं पड़ता चांदी और सोने से।

आ नजरें मिलाकर करले गुफ्तगू
यूं न देख मुझे आंख के कोने से।

दर्द अपना कह दे मुझे,
बढ़ता है अकेले रोने से।
बांटने से कम होगा बोझ
थक जाएगा अकेले ढोने से।।

           - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

रविवार, 2 सितंबर 2018

पढ़े हे फेर कढ़े नइहे

छत्तीसगढ़ी में कहावत है कि,'पढ़े हे फेर कढ़े नइहे' सिर्फ पढ़ने से कुछ नहीं होने वाला। अपने सैद्धांतिक ज्ञान को व्यवहारिक परिस्थितियों में उपादेय बनाने की क्षमता भी होनी चाहिए। हमारे स्कूलों में बहुत से ज्ञान विहीन शिक्षक गुरु बने बैठे हैं और खुद के बच्चों को पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हैं। अंगूठा टेक आदमी विधायक बनकर कानून बना रहा है। हमारे देश के मिनिस्टर और डाक्टर अपना इलाज विदेशों में कराते हैं। जो चौकीदार बनने लायक भी नहीं है वह सिपाही है। नौकरी बहुत है लेकिन उनके लायक लोगों की कमी है। और जो काबिल हैं उनको चार-चार, पांच-पांच नौकरियां भी लग जाती हैं।