गुरुवार, 7 मई 2020

बहरों को आवाज मत दो

बहरों को आवाज मत दो।

भाई! आपने हम लोगों को गूंगे समझ लिया इसमें आपकी कोई खता नहीं है। सब को पता है कि हम अपनी खुद की तकलीफों पर भी नहीं बोलते। कभी हम अपने दर्द की परतें नहीं खोलते। पर राज की बात बताऊं कि हम कभी गूंगे नहीं रहे। आपने हमें गूंगे जान कर हमारी आवाज बनने की कोशिश की इसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। हमारा गूंगापन हमारी कमजोरी की निशानी कतई नहीं है। और हां। हमारे दर्द को आप आवाज भी दे दोगे तो भी कोई फायदा नहीं क्योंकि जिन्हें सुनना है वे बहरे हैं। पूरी तरह से तो बहरे नहीं हैं क्योंकि अपने मतलब की हर बात अच्छी तरह सुन लेते हैं। लेकिन जो उनके मतलब का नहीं उस बारे में तो कुछ भी नहीं सुन पाते। तो भाई! आप हमारी मजबूरी के गूंगापन पर तरस खाए इसके लिए फिर से धन्यवाद! लेकिन ये बहरे जरा भी नहीं सुनेंगे चाहे आप कितना भी ऊंचा बोलें। इसलिए मेरे बंधु! बहरों को आवाज मत दो।

                    ‌         - 'कुन्दन'

चाटुकारों की कसम

चाटुकारों की कसम!
छुटभैय्यों की सौगंध!!
मेरा राजनीति से उस तरह का कोई लेना देना नहीं है
जैसा मतलब इसमें बिलबिला रहे कीड़े निकालते हैं।
किसी की हार-जीत से मेरा मतलब है सिर्फ उतना।
एक सामान्य मतदाता का वास्ता रहता है जितना।
वर्ना मेरे खानदान में आज तक किसी ने किसी भी दल के एक भी भौंकने वाले प्राणी को तवज्जो देने की जरूरत ही नहीं समझी।

मैं पूरी तरह गैर राजनैतिक व्यक्ति हूं
मुझे राजनीति से उतनी ही नफरत है
जितना इनको जनता से लगाव है
उस जनता से दिखावे की लगाव
जो सत्ता हासिल करते तक ही इनके लिए जनार्दन होती है।

किसी की जी हुजूरी न करना मेरी निस्संगता की निशानी भी तो हो सकती  है
लेकिन
हवा में छोड़े गए हर तीर को खुद पर लेने के आदी लोग इसे अपनी मुखालिफत समझते हैं।

दरअसल इस या उस दल के लिए मेरी कोई प्रतिबद्धता नहीं है।
मेरे लिए वे सब आवश्यक बुराई हैं।
न तो इनके बिना रह सकते
और न इनके साथ रह सकते।
इसलिए हमें चुनना होता है उसे जो तुलनात्मक रूप से कम खराब दिखता है।
आम मतदाता की तरह मुझे भी इनसे कम या ज्यादा मात्रा में घृणा है।

न कभी किसी दल की सदस्यता ली।
न कभी  स्वामिभक्ति का पट्टा गले में बांधा ।
न किसी जुलुस में झंडाबरदार था।
न किसी यूनियन सदस्य रहा।

जब मैं खुद के लिए भी गूंगा हूं तो फिर दूसरों की आवाज कैसे बन सकता हूं?
लेकिन मेरी एक कमजोरी है
बस एक यही खता है
कि कभी-कभी मैं अपनी कविता को गालियों से भी सजाता हूं
और फिर उसे जोर से उछालता हूं
जूते की मानिंद।

             - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                     11/04/2020
 
                          सुकमा

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रविवार, 3 मई 2020

हेमलेट

हेमलेट शेक्सपियर का एक उत्कृष्ट नाटक है। इसमें एक करैक्टर है क्लाडियस। वह अपने बड़े भाई को जहर दे कर मार देता है तथा उसकी जगह स्वीडन का सम्राट बन जाता है। जल्दी ही अपनी विधवा भाभी से शादी भी कर लेता है। उधर दिवंगत सम्राट के पुत्र राजकुमार हेमलेट को पता चल जाता है कि उसके पिता को उसके चाचा और अब सौतेले पिता क्लाडियस ने मारा है। हेमलेट प्रतिशोध और कुंठा की अग्नि में जलता रहता है। वह क्लाडियस को मारना चाहता है। क्लाडियस इस बात को जानता भी है। लेकिन जनता का समर्थन हेमलेट के साथ है। अतः जनता में विद्रोह न भड़क जाए इसलिए नया सम्राट चाहकर भी हेमलेट को सीधे सीधे नुकसान नहीं पहुंचा पाता। लेआर्टस फ्रांस का राजकुमार है। उसका पिता पालोनिअस क्लाडियस का मंत्री था। पालोनिअस को हेमलेट क्लाडियस के धोखे में मार देता है। पालोनिअस की बेटी और फ्रांस की राजकुमारी अफोलिया हेमलेट से प्यार करती थी। वह अपने पिता की मृत्यु तथा हेमलेट के प्रेम में पागल हो जाती है। वह झरने में गिर कर मर जाती है। इन कारणों से लेआर्टस हेमलेट से बदला लेने की सोचता है। क्लाडियस इसे हेमलेट की हत्या कराने के अवसर के रूप में बदला चाहता हूं। लेआर्टस हेमलेट को तलवार युद्ध के लिए ललकारता है। जो विषबुझी तलवार हेलमेट को मारने के लिए थी वह धोखे से लेआर्टस के लिए इस्तेमाल हो जाती है और वह मारा जाता है। द्वंद्वयुद्ध में जीतने की खुशी के बहाने जहरीली शराब से हेलमेट को मारने का फिर षड्यंत्र किया जाता है लेकिन इस बार भी हेमलेट बच जाता है।  जहरीली शराब क्लाडिअस को पीना पड़ जाता है।
            कहानी सीधी और सपाट नहीं है। इसमें नाटकीयता और उतार चढ़ाव काफी है।
       चरित्र चित्रण कमाल का है। घटनाओं और संवादों के माध्यम से विभिन्न पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को बखूबी उभारा गया है। पात्रों में प्रेम, कुंठा, प्रतिशोध आदि मनोभावों के चित्रण में नाटककार को महारत हासिल है।
            तत्कालीन परंपराओं, विश्वासों और रूढ़ियों के द्वारा तथा घटनाओं के आलोक में देश और काल का सम्यक निरूपण हो पाया है।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

वागर्थाविव संपृक्तौ

वागर्थाविव संपृक्तौ।

         जब मैं छुट्टियों में होता हूं तो मेरे परिचितों में से कुछ लोग अपने बच्चों को मेरे पास लेकर आते हैं या फिर ऐसे ही पूछ लेते हैं कि बच्चों की सही पढ़ाई के लिए क्या किया जाए? जाहिर है इनमें से कुछ लोग बहुत कुछ खो चुके होते हैं। हर साल लाखों की रकम बतौर स्कूल-फीस तथा हजारों में ट्यूशन फीस। यह तो सिर्फ पैसों की बात हुई। इसके अलावा भी बहुत कुछ खो चुका होता है। रुपए पैसे तो फिर से कमा लेंगे लेकिन बच्चों का सुनहरा बचपन हमारी गलतियों की वजह से खो गया उसका क्या होगा? समय तो वापस आएगा नहीं। लेकिन हमारी गलतियां खुद हमारे सामने बड़े बड़े प्रश्न चिन्हों के रूप में बार-बार खड़ी हो जाएगी। कई बार हम अपनी गलतियां नहीं जानते और बुराइयों को अच्छाई समझ कर गले लगा लेते हैं। जब हमें एहसास होता है कि कुछ तो ऐसी गलतियां हुई हैं जो बेसिक हैं तब खुद को जिंदगी भर कोसते रहते हैं कि हमने ऐसा क्या पाप कर दिया? लेकिन बच्चों का बचपन छीन लेना छोटा मोटा पाप तो बिल्कुल नहीं है। बचपन और किशोरावस्था व्यक्तित्व के निर्माण और विकास के सबसे अधिक महत्वपूर्ण चरण होते हैं। यह समय माता-पिता और अभिभावकों की अग्निपरीक्षा का होता है। परंतु दुख के साथ यह कहना पड़ता है कि अधिकांश अभिभावक इसमें असफल हो जाते हैं। हो सकता है कि आकर्षक यूनिफॉर्म और अन्य तामझाम तथा ऊंची फीस से हम कुछ समय के लिए अपने थोथे अहं को तत्कालिक तौर पर खुश कर लें लेकिन यह तो समस्या का समाधान कतई नहीं है। मैं तो कहना चाहता हूं कि यही हमारी समस्याओं का मुख्य कारण है। विदेशी भाषा में अध्ययन व्यक्तित्व के विकास में सबसे बड़ा घातक है। हर कोई अपनी मातृभाषा में ही सोचता है। इसलिए विचारों और भावनाओं की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही होती है। अंगरेजी में पढ़ाई-लिखाई को ही सबकुछ मान लेना एक बहुत बड़ी गलत फहमी है। अगर अॅंगरेजी बोलना ही बुद्धिमानी की निशानी होती तो इंग्लैंड में कोई भी मूर्ख या पागल नहीं होता। भाषा उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्त्वपूर्ण हमारे समझने, सोचने, विचारने और अभिव्यक्त करने के मानसिक उपकरण होते हैं। हमारे मानसिक उपकरण हमारी अपनी भाषा में सबसे अच्छा काम करते हैं। यह ठीक है कि अंगरेजी दुनिया की व्यापक तौर पर व्यवहार में लायी जाने वाली भाषा है। लेकिन इसे तो कभी भी सीखा जा सकता है। यह इतनी महत्वपूर्ण नहीं है कि इसके लिए बच्चों की  मानसिक बौद्धिक क्षमता का विकास ही अवरुद्ध कर दिया जाए।
   रही बात पब्लिक स्कूल के टीचर्स की तो बेचारे इतने योग्य होते नहीं हैं कि वे अपनी शिक्षा दीक्षा के दम पर सरकारी शिक्षक बन सकें या दूसरी सरकारी नौकरी हासिल कर सकें। 
 अब ट्यूशन पर आते हैं। किसलिए ट्यूशन कराते हैं। जाहिर है कि बच्चे खुद से तो समझ सकते नहीं। स्कूल के ग्यारह महीनों की पढ़ाई भी किसी काम की नहीं होती। वरना किसी भी पाठयपुस्तक की भाषा और अध्ययन सामग्री का स्तर उतना ही होता है जितना कि उस कक्षा का औसत स्तर का विद्यार्थी अगर कोशिश करे तो उसे समझ सके। लेकिन अधिकतर बच्चे नहीं समझ सकते। क्योंकि उनकी बुनियाद ही कमजोर है। वह छठवीं कक्षा का ही नहीं समझ पाया है तो फिर सातवीं का कैसे समझ पाएगा? वास्तव में वह बच्चा फेल हो चुका है। जो पूर्व कक्षा की अध्ययन सामग्री को खुद से पढ़कर समझ नहीं पाए उसे तो फेल ही कहेंगे ना? लेकिन अभिभावकों की आंखों में धूल झोंककर बच्चों को उचित तरीके से पढ़ाए सिखाए बिना हाई पर्सेंट से पास कर दिया जाता है। लोग प्रोग्रेस रिपोर्ट देख कर खुश हो लेते हैं। लाखों रुपयों का प्रतिफल सिर्फ इतना ही है। 
       आपका बच्चा सही पढ़ रहा कि नहीं इसे आप बिल्कुल आसान तरीके से जान सकते हैं। वह जो भी पढ़ रहा है उसमें से एक आध चैप्टर या एक दो पैराग्राफ अपनी मातृभाषा में समझाने बोलिए। अगर आपका बच्चा अंगरेजी में लिखी हुई सामग्री को मातृभाषा में या मातृभाषा में लिखी हुई सामग्री को आपकी बोली में आपको समझा दे तो आपका बच्चा अपने स्कूल की सीमाओं को लांघ चुका है। तब आपके बच्चे को बड़ा बनने से आपके सिवा कोई दूसरा नहीं रोक सकता।
            हमारी एक बड़ी गलती यह भी होती है कि हम अपनी असफलताजन्य कुंठाओं को बच्चों के द्वारा दूर करना चाहते हैं। जो हम पूरी जिंदगी नहीं कर सके हम उसे अपने बच्चों से कराना चाहते हैं। यह भी एक बड़ी गलती है। बच्चा बड़ा होकर अपना रास्ता तलाश सकता है। ऐसा नहीं है कि बच्चे मित्रमंडली के प्रभाव में गलत निर्णय नहीं कर सकते। करते भी हैं। वह इसलिए कि आपने उसे इस लायक बनाया ही नहीं है कि वह अपने लिए अच्छा निर्णय कर सके। उसके बारे में निर्णय या तो हम करेंगे या उसके दोस्त। बात तो दोनों स्थितियों में गलत है। लेकिन वह बच्चा ईश्वर की या कुदरत की अन्यतम रचना है। अरबों इंसानों में एक और इंसान बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? मजे की बात है कि वह किसी की प्रतिलिपि भी नहीं है। अपने मां बाप की भी नहीं। बिल्कुल एक अलग इंसान एक अलग व्यक्तित्व। तो फिर उसको अपने सांचे में ढालने का अधिकार किसी को नहीं है। हमें तो उसे सिर्फ सामाजिक व्यवहार और संस्कार देना है ताकि वह समाज, परिवार और राष्ट्र का एक जिम्मेदार सदस्य बन सके; उस पर अपनी विचारधारा नहीं थोपना है। लेकिन खुद के अधूरे असफल सपनों को पूरा करने के लिए उसके स्वाभाविक विकास में बाधक होगा गलत ही कहा जा सकता है।
       अक्सर हम बच्चों को छोटा समझने की गलती कर देते हैं। उसे अबोध समझकर उसके सामने उलटा सीधा काम करते हैं। हम यह समझने की गलती कर देते हैं कि छः महीने का बच्चा कुछ भी जानता समझता नहीं है। क्या बच्चा जब बोलने लगेगा तभी मानेंगे कि अब वह समझने लगा है? बेशक समझने के लिए भाषा बहुत जरूरी साधन है। लेकिन क्या बच्चों को भाषा और शब्दों की समझ अचानक से आ जाती है। बच्चों के मुंह से बोल फूटने के महीनों पहले ही अनेक शब्द उसके मन में अर्थ ग्रहण कर चुके होते हैं यह अलग बात है कि वह बाद में बोल पाता है। और फिर जो किसी भाषा को नहीं समझ पाता वह देहभाषा या बाडी लैंग्वेज के द्वारा बहुत कुछ समझ सीख जाता है। यह बात संभवतः बच्चों के साथ और अधिक ठीक है क्योंकि वह अपने आप को अपनी छोटी सी दुनिया में अभिव्यक्त करने के लिए छटपटा रहा होता है। इसलिए बेहतरी इसी में है कि बच्चे को शुरु से ही बाप दादी की तरह सम्मान प्रदान करें और उनके सामने तमीज से पेश आएं चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो?
         पब्लिक स्कूल की आलोचना मैं इसलिए अधिक करता हूं कि वह अंगरेजी माध्यम थोपता है। मेरा यह व्यक्तिगत अनुभव है कि निजी विद्यालय खासकर इंग्लिश मीडियम वाले जमीन से उखड़े लोग बनाते हैं। लोग  लाखों की गाढ़ी कमाई खर्चा करके पढ़ाते हैं । एक बार मुझे बहुत अच्छे माने जाने वाले दो पब्लिक स्कूलों ने मेरी बच्ची को मुफ्त में पढ़ाने का आफर किया था। जब वह पांचवीं कक्षा में मेरिट से पास हुई थी तब से कक्षा ग्यारहवीं तक वे मेरे पीछे पड़े थे लेकिन मैंने उनका आकर्षक प्रस्ताव ठुकरा दिया। आज वह अपने हिसाब से ठीक ठाक स्थिति में है।
      उच्च कक्षाओं में तो अंगरेजी माध्यम से पढ़ना मजबूरी हो सकती है। परंतु उसमें कोई परेशानी नहीं होती क्योंकि माध्यम कुछ भी हो अपने विषयों की तकनीकी शब्दावली से लगभग सभी विद्यार्थी परिचित होते ही हैं ‌। अब करना इतना है कि अंगरेजी की सहायक क्रियाओं और संयोजक शब्दों को उसमें लगाना भर है। वैसे भी उत्तर और मध्य भारत के उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों की अंगरेजी कितनी अच्छी होगी ये तो वह खुद अच्छे से जानते हैं। भाषा कितनी भी सशक्त हो उसमें कमी तो रहती है और उसमें समय के साथ साथ सुधार होता है। लेकिन पढ़ाई उसी भाषा में करनी चाहिए जिसमें हम सशक्त हैं। जाहिर है कि बच्चे मातृभाषा में ही सशक्त होते हैं इसलिए यही सर्वोत्तम है। दरअसल किसी भी विषय को अच्छी तरह समझने और वयक्त करने के लिए हमें दो चीजों की जरूरत होती है। पहली भाषा और दूसरा चिंतन अर्थात् संश्लेषण-विश्लेषण-निर्णयन की क्षमता। भाषा जितनी सशक्त होगी हम उतने ही अच्छे समझ सकते हैं। इसका उलटा भी ठीक है। मतलब जैसे जैसे जीवन और जगत के प्रति हमारी समझ बढ़ती जाती है वैसे वैसे ही हमारी भाषायी शक्ति और शब्दावली में इजाफा होते जाता है। तो यह कहना बेमानी है कि वह जानता समझता तो है लेकिन शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। शब्द और वाक्य ही वह उपकरण हैं जिसके द्वारा ही हम ज्ञान का अर्जन कर सकते हैं। कालिदास ने काफी सोच-विचार ही लिखा होगा; वागर्थाविव संपृक्तौ। जानना समझना किसी न किसी भाषा या बोली में होता है। इसके बिना ज्ञानी होने का दावा करना मूर्खता होगी।
   अब हम दूसरी बात पर आते हैं। चिंतन या संश्लेषण, विश्लेषण और निर्णयन की क्षमता। यह उतनी ही ज़रूरी है जितनी भाषा है। आज हर प्रतियोगिता परीक्षा में रिजनिंग और एप्टीट्यूड टेस्ट होता है। यहां तक कि कक्षा छह में नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा में भी। तार्किक विश्लेषण और गणित हमें अमूर्त चिंतन के योग्य बनाता है। अमूर्त चिंतन मतलब बिना चीजों के सोचना। गणित में सिर्फ 'बीजों' की सहायता से सामान्य सूत्रों का निगमन किया जाता है। नवोदय विद्यालय प्रवेश परीक्षा का पाठ्यक्रम देश के बड़े-बड़े शिक्षाविदों ने काफी सोच विचार कर निर्धारित किया है। इसमें अंगरेजी माध्यम अनिवार्य नहीं है। इसमें सफल होने वाले 99.99% बच्चे भी अपनी मातृभाषा में परीक्षा देने वाले होते हैं। इसके पाठ्यक्रम में भाषा, गणित और तर्क शक्ति होती है। 
            अंगरेजी राज ने हमें पश्चिमी दुनिया के ज्ञान विज्ञान से परिचय कराना शुरू किया। अतः अंगरेजी भाषा को आधुनिकता की वाहक समझा गया। लेकिन अंगरेजों के द्वारा लाया गया आधुनिकीकरण भोंडा और अधूरा है। यह भारत का पश्चिमीकरण था न कि आधुनिकीकरण। ज्ञान विज्ञान को भारतीय भाषाओं में प्रसारित किया जाना चाहिए था। जैसा कि रुस, जर्मनी, फ्रांस, जापान आदि देशों में उनकी अपनी भाषाओं में हुआ है, लेकिन दुर्भाग्यवश भारत में ऐसा नहीं हुआ। धन्यवाद!
बात अभी बाकी है।

            -   किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'
                     18/04/2020

रविवार, 12 जनवरी 2020

स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है

झीरम के बहाने

जब-जब यहां से और ऐसी दूसरी जगहों से गुजरता हूं तो मुझे ज्यां पाल सार्त्र का यह कथन याद आ जाता है कि 'व्यक्ति स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है।' हालांकि युद्ध के मैदान में जाने का आदेश वरिष्ठ का होता है जिसमें बाध्यता होती है। यहां तक कि समय और साधन तथा जवानों की संख्या भी उन्हीं के द्वारा तय की गई होती है। सबसे मुश्किल बात यह होती है कि युद्ध या मुठभेड़ का मैदान हमारे प्रतिद्वंद्वियों द्वारा चुना गया होता है जो कि उनके लिए अनुकूल और हमारे लिए जितना ज्यादा हो सके प्रतिकूल होता है। प्रतिद्वंद्वियों? जी! आपने सही पढ़ा। हम अपनी जान के दुश्मनों को दुश्मन नहीं कह सकते। अन्यथा तथाकथित मानवाधिकारवादी खेमा नाराज हो जाएगा। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों में जो कुछ भी घटित होता है उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी हमारी होती है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि तमाम पूर्व निर्धारितता के बावजूद इस बात की गुंजाइश हमेशा मानी जाती है कि हम हमारे काम को उससे भी बेहतर तरीके से कर सकते थे कि हमारा नुकसान न हो। कभी-कभी हमसे यह भी उम्मीद की जाती है कि विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से लैस आततायियों को हमे जिंदा पकड़ना चाहिए ? चाहे वह हमारे साथियों के सीने में पूरी मैगजीन की गोलियां ही क्यों न दाग दे? तो हम यहां भी स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है। चाहे हमारी जान के भूखे भेड़ियों की संख्या कितनी भी क्यों न हो? चाहे वे सर्वथा अनुत्तरदायी शक्ति से संपन्न क्यों न हो? और चाहे वरिष्ठ का आदेश जमीन और हालात से ना-वाकिफ व्यक्ति की सनक की उपज ही क्यों न हो? यदि जंग के मैदान में अपनी या अपने संरक्षितों की जान नहीं बचा पाए तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी उन अभागे जंगजुओं की होती है जिन्होंने अपनी जान भी गंवा दी। बाद में केस स्टडी में कर्त्तव्य पथ पर सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए तैयार किए जा रहे योद्धाओं को पढ़ाया जाता है कि उन लोगों ने अमुक-अमुक गलतियां कीं इसलिए वे सब मारे गए। जी हां; यही कहते हैं कि मारे गए। शहीद नहीं कहते। शहीद तो वे भी कहे जाते हैं जिन्होंने कभी शस्त्र नहीं उठाए, जिन्होंने कभी मक्खी भी नहीं मारीं और खुद के बनाए मकड़जाल में खुद की गलतियों से फंसकर मर गये। खास बात यह है कि हम केवल युद्ध के मैदान में मुठभेड़ के दौरान स्वतंत्र हैं क्योंकि तब हमारे एडवांस के तरीके में, आगे बढ़ने के तरीके में खामी की वजह हमें ठहराया जा सके। तो हम स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त हैं इसलिए जिम्मेदारी भी हमारी होती है कि हमने अपनी गलतियों से अपनी जान दे दी।

        यह क्रूर स्वतंत्रता न केवल घोर अनास्था और अविश्वास पैदा करती है बल्कि भरोसा और विश्वास भी देती है। हमारे जवान हम पर भरोसा भी करते हैं और हमारे विश्वास में खरे भी उतरते हैं इसलिए हमसे टकराने वाले मरते हैं।
जय हिन्द!
जय जवान!!

रविवार, 5 जनवरी 2020

ले लिया मुझे निशाने में

मैं तो मशगूल था उसके कदमों में कालीन बिछाने में।
आसान शिकार समझकर ले लिया मुझे निशाने में।।

उसकी शान में झुकता रहा मैं और वह लगे रहे मुझे गिराने में।

वक्त अपना जाया किया उसने, तरकस के सब तीर आजमाने में।

उसी से हार कैसे जाता मैं और भी तो हैं दुश्मन जमाने में।

मैं तो मशगूल था उसके कदमों में कालीन बिछाने में।
आसान शिकार समझकर ले लिया मुझे निशाने में।।
              
            - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                    05/01/2020
                   जेल बाड़ी, सुकमा

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गुरुवार, 14 नवंबर 2019

न मैं शोहरत चाहूं

न मैं शोहरत चाहूं, न मुझे होशियारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

मूंछों पर मैं ताव दूंगा।
दुश्मनों को घाव दूंगा।।
सिर्फ देश के लिए दिल धड़के ऐसी बेकरारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

हिमालय से मुश्किल रस्ता हो।
सामने चाहे टैंक-दस्ता हो।।
कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ने की जिम्मेदारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

अमन की हिफाजत करूंगा।
आखिरी सांस तक मैं लड़ूंगा।।
देशहित में मर मिटने की मेरी बारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

न मैं शोहरत चाहूं, न मुझे होशियारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

                 - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                        26/08/2019
               मुरागांव छावनी, जिला-कांकेर

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