रविवार, 12 जनवरी 2020

स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है

झीरम के बहाने

जब-जब यहां से और ऐसी दूसरी जगहों से गुजरता हूं तो मुझे ज्यां पाल सार्त्र का यह कथन याद आ जाता है कि 'व्यक्ति स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है।' हालांकि युद्ध के मैदान में जाने का आदेश वरिष्ठ का होता है जिसमें बाध्यता होती है। यहां तक कि समय और साधन तथा जवानों की संख्या भी उन्हीं के द्वारा तय की गई होती है। सबसे मुश्किल बात यह होती है कि युद्ध या मुठभेड़ का मैदान हमारे प्रतिद्वंद्वियों द्वारा चुना गया होता है जो कि उनके लिए अनुकूल और हमारे लिए जितना ज्यादा हो सके प्रतिकूल होता है। प्रतिद्वंद्वियों? जी! आपने सही पढ़ा। हम अपनी जान के दुश्मनों को दुश्मन नहीं कह सकते। अन्यथा तथाकथित मानवाधिकारवादी खेमा नाराज हो जाएगा। इन तमाम विपरीत परिस्थितियों में जो कुछ भी घटित होता है उसकी संपूर्ण जिम्मेदारी हमारी होती है। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि तमाम पूर्व निर्धारितता के बावजूद इस बात की गुंजाइश हमेशा मानी जाती है कि हम हमारे काम को उससे भी बेहतर तरीके से कर सकते थे कि हमारा नुकसान न हो। कभी-कभी हमसे यह भी उम्मीद की जाती है कि विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र से लैस आततायियों को हमे जिंदा पकड़ना चाहिए ? चाहे वह हमारे साथियों के सीने में पूरी मैगजीन की गोलियां ही क्यों न दाग दे? तो हम यहां भी स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है। चाहे हमारी जान के भूखे भेड़ियों की संख्या कितनी भी क्यों न हो? चाहे वे सर्वथा अनुत्तरदायी शक्ति से संपन्न क्यों न हो? और चाहे वरिष्ठ का आदेश जमीन और हालात से ना-वाकिफ व्यक्ति की सनक की उपज ही क्यों न हो? यदि जंग के मैदान में अपनी या अपने संरक्षितों की जान नहीं बचा पाए तो इसकी संपूर्ण जिम्मेदारी उन अभागे जंगजुओं की होती है जिन्होंने अपनी जान भी गंवा दी। बाद में केस स्टडी में कर्त्तव्य पथ पर सब कुछ न्यौछावर कर देने के लिए तैयार किए जा रहे योद्धाओं को पढ़ाया जाता है कि उन लोगों ने अमुक-अमुक गलतियां कीं इसलिए वे सब मारे गए। जी हां; यही कहते हैं कि मारे गए। शहीद नहीं कहते। शहीद तो वे भी कहे जाते हैं जिन्होंने कभी शस्त्र नहीं उठाए, जिन्होंने कभी मक्खी भी नहीं मारीं और खुद के बनाए मकड़जाल में खुद की गलतियों से फंसकर मर गये। खास बात यह है कि हम केवल युद्ध के मैदान में मुठभेड़ के दौरान स्वतंत्र हैं क्योंकि तब हमारे एडवांस के तरीके में, आगे बढ़ने के तरीके में खामी की वजह हमें ठहराया जा सके। तो हम स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त हैं इसलिए जिम्मेदारी भी हमारी होती है कि हमने अपनी गलतियों से अपनी जान दे दी।

        यह क्रूर स्वतंत्रता न केवल घोर अनास्था और अविश्वास पैदा करती है बल्कि भरोसा और विश्वास भी देती है। हमारे जवान हम पर भरोसा भी करते हैं और हमारे विश्वास में खरे भी उतरते हैं इसलिए हमसे टकराने वाले मरते हैं।
जय हिन्द!
जय जवान!!

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