मंगलवार, 30 जुलाई 2019

राष्ट्रवाद और नारे

वंदे मातरम्।
भारत माता की जय।
ये सब ऐसे नारे हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान देश के करोड़ों लोगों को राष्ट्रीयता की भावना से अनुप्राणित किया तथा आजादी के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रेरणा दी। आज भी ऐसे नारों के उद्घोष से जन-समूह देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो जाता है। देश प्रेम की भावना को अभिव्यक्त करने वाले ऐसे नारों का उपयोग अच्छी बात है क्योंकि आम जनता ऐसे ही नारों और पोस्टरों से प्रेरित होती है।
लेकिन जो व्यक्ति या समूह इन नारों का इस्तेमाल नहीं करता क्या वह देशभक्त नहीं है। मैं नहीं समझता हूं कि देश भक्ति की भावना केवल नारों तक सीमित है। छाती पीट-पीट कर चिल्लाने और दिन-रात पाकिस्तान जैसे घटिया मुल्क को कोसते रहने से ही हम देशप्रेमी नहीं हो जाते। आजादी की लड़ाई के दौरान और उसके बाद भी भारत में अनेक ऐसे नेता हुए जिन्होंने ऐसे नारों का इस्तेमाल नहीं किया लेकिन उनकी देशभक्ति की भावना पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकते। चिल्ला-चिल्ला कर देशभक्ति व्यक्त करना भी जरूरी नहीं है। एक मजदूर दिन भर मेहनत करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता है और किसी का अहित नहीं सोचता। क्या यह देश प्रेम नहीं है? किसान, शिक्षक, प्रशासक, राजनेता, बुद्धिजीवी आदि सब अपने-अपने कर्त्तव्यों में रत हैं। यही देश सेवा है। यही राष्ट्रप्रेम है।
जो सिर्फ़ और सिर्फ़ देश के लिए जीता और मरता है ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम होगी। अन्यथा अधिकतर जनसंख्या रोजी रोटी और रोजमर्रा की दीगर जरूरतों को पूरी करने में ही अपना जीवन खपा देती है। इसमें राष्ट्रद्रोह जैसी बात कहां से आ जाती है? लेकिन भारतीय समाज में बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो खुद को देशभक्ति के स्वयंभू रखवाले मानते हैं। अगर राष्ट्रवाद के ये ठेकेदार लोगों को पकड़-पकड़ कर वंदे मातरम् बोलवाने की कोशिश करें तो कहां तक जायज है? हमारे यहां एक गलत बात यह भी होती है कि कुछ विशेष वर्ग के लोगों से बात-बात पर देशभक्ति का सबूत मांगते हैं। जो गद्दार हैं। जो देश को तोड़ने के सरेआम नारे लगाते हैं उनका तो कुछ कर नहीं पाते। लेकिन आम लोगों को नाहक परेशान करते रहते हैं तथा अल्पसंख्यकों के बारे में ऐसी राय रखते हैं जैसे वे भारतीय नहीं होकर शरणार्थी हों। जब तक विपरीत प्रमाण नहीं मिलता किसी को भी किसी अन्य की देशभक्ति पर संदेह करने की जरूरत नहीं है। दर असल राजनीतिक स्वार्थों ने देश के नाज़ुक सांप्रदायिक सौहार्द्र को असंतुलित कर रखा है। देश की मीडिया भी नकारात्मकता के अंध महासागर गोते लगा रही है। उसका राष्ट्रवादी चरित्र समाप्त हो चुका है। आज मीडिया न तो निष्पक्ष है और न ही प्रतिबद्ध है। सोशल मीडिया में भी अनुत्तरदायित्वपूर्ण नकली खबरों की भरमार रहती है। इसलिए बहकावे में नहीं आएं। और सामाजिक समरसता को बढ़ाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास करें।
                                जय हिन्द!

बिन पानी छूटत हे परान

बड़ जतन से बोएन  धान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

बरसा के चार महीना घूमन मोरा में।
अब सावन बीतगे बादर के अगोरा में।।
तरिया नंदिया सब सुख्खा परगे
कभू सब ल पूरा-पानी नहकान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

धनहा डोली में अब नइ तंउरे अइरी।
मेचका के नइ हे टेट-टेरी बोर-बोरी।।
गाय-गरु घलो हे हलाकान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

खेत में बनिहारीन के गीत नइ हे।
मौसम अब हमर मीत नइ हे।।
पहिली बरसत पानी में नहान।।
अब बिन पानी छूटत हे परान।।
बड़ जतन से बोएन धान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

       
         किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
              26/07/2019
          मुरागांव (कोरर) कांकेर।

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बुधवार, 17 जुलाई 2019

मेघदूत

मेघदूत

मेघदूत संस्कृत में लिखित खंडकाव्य है। महान साहित्यकार कालिदास ने इसकी रचना की है। इसमें कुबेर के दरबार में प्रतिदिन सुबह फुल पहुंचाने वाले माली का कार्य करने वाले किसी यक्ष की कहानी है जो अपने काम में कोई गलती करने के कारण न केवल सेवा से बर्खास्त किया गया था, साथ में उसे देश निकाला भी दे दिया गया था। वह छत्तीसगढ़ के रामगढ़ की पहाड़ी में अपने प्रव्रजन का समय व्यतीत कर रहा था। आषाढ़ मास के प्रथम दिन आकाश में बादलों को देख कर उसे अपनी जीवन संगिनी की स्मृति और गहरी हो जाती है। इसलिए वह बादल के सामने ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करने लगता है।मेघ को अपना दूत मानकर अपनी संगिनी के पास ले जाने के लिए संदेश कहता है। मेघदूत में सरगुजा से लेकर हिमालय क्षेत्र तक रामगिरि से लेकर अलकापुरी तक के विभिन्न जनपदों का, वहां के प्राकृतिक सौंदर्य का, जन-जीवन और विविध संस्कृतियों का जितना सुन्दर विवरण कालिदास ने किया है वैसा शायद किसी ने किया होगा। अगर मध्य भारत और उत्तर भारत के सांस्कृतिक भूगोल को समझना है तो मेघदूत भी पढ़िए। रही बात श्रृंगार रस की तो इसमें भी कालिदास की बराबरी के साहित्यकार बहुत कम है।

बुधवार, 10 जुलाई 2019

ऐ दिल! तूने सपने बड़े-बड़े क्यों पाले हैं?

हम तो छोटी बातों में भी खुश होने वाले हैं।
ऐ दिल! तूने सपने बड़े-बड़े क्यों पाले हैं??

सूरज को यहां लाने की बातें न कर,
मेरे के लिए काफी, दीयों के उजाले हैं।।

पांच-सितारा में खाने की उसको ख्वाहिश कहां?
जिसके नसीब में मां के हाथों के निवाले हैं।।

बड़प्पन का बोझ सहना सबके बस में नहीं।
बुनियाद में दबकर भी कुछ लोग मुस्कराने वाले हैं।।

हम तो छोटी बातों में भी खुश होने वाले हैं।
ऐ दिल! तूने सपने बड़े-बड़े क्यों पाले हैं??

                    - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                            10/07/2019
                               ग्राम - छीपा
                              राजनांदगांव

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

मंगलवार, 9 जुलाई 2019

कर्त्तव्यों में भी भागीदारी चाहिए

केवल अधिकारों में हिस्सेदारी नहीं
कर्त्तव्यों में भी भागीदारी होनी चाहिए।

सिर्फ कौम की क्यों सोचें,
वतन के लिए भी जिम्मेदारी होनी चाहिए।।

बड़े कष्टों के बाद मिली है आजादी,
इसे सहेजने की समझदारी होनी चाहिए।।

अपनों से मुहब्बत ही ठीक है यारों
दुश्मनों के लिए दिलों में चिन्गारी होनी चाहिए।।

वतन पर मिटने वालों की जज़्बात समझ सकें
इतनी सी तो दिलदारी होनी चाहिए।।

केवल अधिकारों में हिस्सेदारी नहीं
कर्त्तव्यों में भी भागीदारी होनी चाहिए।।

                      - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

दिनांक 03/06/2019
राजनांदगांव
©सर्वाधिकार सुरक्षित

कम्युनिज्म

नक्सलवादियों की विचारधारा कम्युनिज्म (साम्यवाद)

सोवियत यूनियन में फेल,
पूर्वी जर्मनी में फेल,
चेकोस्लोवाकिया में फेल,
हंगरी में फेल,
कंबोडिया में फेल,
क्यूबा में फेल,
वियतनाम में फेल,
उत्तर कोरिया में फेल,
चीन में पूंजीपतियों के सामने नतमस्तक मतलब फेल,
पोलैंड में फेल,
रोमानिया में फेल,
वेनेजुएला में फेल,
नेपाल में फेल,
पूरी दुनिया में फेल;

फिर भी कुछ सिरफिरे इसे भारत में अपनाने के लिए मरे जा रहे हैं।

और फिर पश्चिम बंगाल में दशकों तक राज करने के बाद उन लोगों ने कौन-सा तीर मार लिया?

नंदीराज विरोध

नंदीराज विरोध

पारंपरिक नृत्य करते हुए विरोध!
इससे अधिक शांतिपूर्ण तरीका और क्या होगा?
कुछ बुद्धिजीवियों को अब तक यह शिकायत रही है कि आदिवासी इलाकों में विशेषकर बस्तर आदि क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हेतु सशस्त्र विद्रोह जैसे हिंसक और गैर लोकतांत्रिक तरीके अपनाए जाते रहे हैं। यहां सशस्त्र संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है तथा यहां के लोग शांतिपूर्ण विरोध के तरीकों से परिचित नहीं हैं। लेकिन बात तो इसके ठीक उल्टी है। मतलब जब शांतिपूर्ण ढंग से सुनवाई नहीं होती तब हिंसात्मक होने का खतरा बढ़ जाता है। हमें शिकायत रही है कि बस्तर वासी अपनी मांगों को बताते नहीं है व्यक्त नहीं करते, सीधे एक्शन लेते हैं। आज वे चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे हैं।नाच-गा कर जता रहे हैं। अब भी बहरे बने रहें तो अनर्थ हो जाएगा। धीमी आवाज को नहीं सुन पाए तो ऊंची आवाज सुननी पड़ेगी या फिर सुनने लायक कुछ रह नहीं जाएगा। अभी इनको सुन लेने से लोकतंत्र और मजबूत होगा। अन्यथा वही होगा जो नक्सली चाहते हैं।
            चाहे कोई भी शासन प्रणाली हो, लोकतंत्र हो या साम्यवादी शासन या राजतंत्र ही क्यों न हो; जनता ही शक्ति का केंद्र होती है। जनमत जिसके साथ है वही सिकंदर होगा। नक्सलियों को हराने के लिए जनता के बीच जाना जरूरी है। अब जनता खुद सामने आ गई है तो उसकी कद्र करना बहुत जरूरी है। जनमत की अवहेलना से तो बड़े-बड़े साम्राज्य बिखर गए। गरीब,बेबस और मजबूर लोगों को कमजोर समझने की गलती आज नहीं तो कल भयंकर पछतावा लायेगी।
         पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अरबों रुपए खर्च किया जाता है। वह भी इस अव्यवहारिक तरीके से कि उसका कोई प्रतिफल नहीं मिलता। लेकिन अब जब प्रकृति की संतानें जंगलों और पहाड़ों की रक्षा करने के लिए खुद आगे बढ़कर आ रही हैं तो उनका सम्मान किया जाना चाहिए। याद रखें कि उन्होंने हजारों वर्षों तक पर्यावरण की रक्षा की है, प्रकृति की पूजा की है। जगंल-पहाड़ आदि वनवासी समुदाय की संपत्ति है। इसलिए यहां किसी भी तरह की बाहरी गतिविधियां उनकी सहमति और सहभागिता के बिना नहीं होनी चाहिए।
आदिवासियों की तकनीक और जीवन शैली प्रकृति के सर्वाधिक निकट और पर्यावरण के अनुकूल हैं। इसलिए हमें उनका, उनकी परम्पराओं और संस्कृति का दिल और दिमाग से सम्मान करना चाहिए।

जय जोहार!

डिस्क्लेमर:- कृपया राजनीतिक वक्तव्य से बचें।
11/06/19

विरोध का मर्म


विरोध का मर्म।

विरोध के स्वर को सहना,सुनना,समझना तथा समझौते और समाधान की ओर अग्रसर होना एक अच्छे लोकतांत्रिक राष्ट्र की पहचान है। यदि विरोध को बल पूर्वक दबा दिया जाता है तो उसके देर-सबेर विद्रोह में परिवर्तित होने की आंशका बनी रहती है क्योंकि किसी भी समुदाय के असंतोष की भावना को अनंतकाल तक टाला नहीं जा सकता। कभी न कभी सम्मानजनक समझौते की स्थिति में पहुंचना ही होगा। संवाद अर्थात् बातचीत ही समाधान पर पहुंचने का सीधा और सरल राजमार्ग है। अन्य रास्ते टेढ़े-मेढ़े और कष्टप्रद हैं।
      बात नंदीराज पहाड़ की रक्षा के लिए डटे दक्षिण बस्तर के आदिवासियों के आन्दोलन के संदर्भ में हो रही है। दरअसल अब तक बस्तर का इतिहास सतत शोषण और दोहन का इतिहास रहा है। अन्नम देव के समय से या उससे भी पहले से इस क्षेत्र में तेलुगु भाषा-भाषी लोग प्रभावी रहे हैं और तब से लेकर अब तक स्थानीय मूल निवासी दोयम दर्जे से भी बदतर निम्न स्तर की जिंदगी जी रहे हैं। बस्तर में अब तक जो भी बाहरी लोग आए ,लगभग सभी ने आदिवासियों की सरलता का गलत फायदा उठाया। चाहे वे अँगरेजों के नुमाइंदे हों या मराठी बंजारे,चाहे बांग्लादेशी शरणार्थी हों,चाहे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हों या चाहे भारत के अन्य भागों में अपराध करके बस्तर के घने जंगलों में छिपे पापी या उनकी संतानें हों और चाहे नक्सली ही हों; सबने बस्तर और बस्तरिहों को दोनों हाथों से लूटा। सबने उनकी सिधाई का लाभ उठाया।
           जिन्होंने पुरापाषाणकाल से लेकर अब तक जंगलों पहाड़ों में अपनी सभ्यता को विकसित किया, अपनी  संस्कृति को पल्लवित-पुष्पित किया, उनके प्राकृतिक रहवास को विकास के नाम पर धीरे-धीरे कुतर कर समाप्त किया जा रहा है। उन्होंने तो विकास की मांग नहीं की है। भोंडा विकास उनको नहीं सुहाता। एक तरफ महानगरों में शुद्ध वायु सेवन के लिए आक्सीजोन बनाए जाते हैं दूसरी ओर वनवासी क्षेत्रों में प्रदूषण फैला रहे हैं। यह तो परले दर्जे का दोगलापन है। आदिवासी ऐसे विकास को दूर से भी नमस्कार नहीं कर रहे हैं तो फिर उन पर जबरन लादा जाना अनुचित है। यहां तो हर पेड़ में देव का निवास है जबकि पूरे पहाड़ को समाप्त कर देने की बात हो रही है।
             तथाकथित आधुनिक लोगों को प्रभु इतनी सद्बुद्धि जरूर दे कि भोले-भाले वनवासियों के सहज पर्यावरणीय बोध को दकियानूसी सोच समझने की गलती नहीं करें।

जय जोहार!

डिस्क्लैमर:- कृपया राजनीति प्रेरित वक्तत्व से बचें।
12/06/19

सुकमा यात्रा

मैं बस से सुकमा जा रहा हूं। कहने को तो केशलूर से कोंटा रोड नेशनल हाईवे है लेकिन यह आज भी टू-लैन है; कई स्टेट हाइवे से भी गया गुजरा। गुप्ता ट्रैवल्स की मिनी बस ठसाठस भरी हुई है। अधिकतर सवारी स्थानीय आदिवासी ही हैं; निहायत सीधे, सरल और सज्जन लोग। बहुत से लोग जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं माखूर दबाए हुए हैं। कई तो मंद पी के सुबह से 'माते' हुए हैं। बस में गाना भी कंडक्टर च्वाइस वाले बज रहे हैं जिन्हें बर्दाश्त करते-करते मैं झुंझला चुका हूं। लेकिन अब किशोर कुमार का उडलई उडलई वू... बज रहा है,अन्यथा मैं गाना बंद करने का फरमान जारी कर चुका होता जिसकी शायद ही तामीली होती। चिल्लपों और दमघोंटू माहौल में 'सफर' कर रहा हूं। लेकिन जब बस चलती रहती है तभी सुखद यात्रा का भान होता है। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है। ऊपर से यह गाना "चला जाता हूं किसी की धुन में धडकते दिल के तराने लिए.."। संयोग से मुझे खिड़की वाली सीट भी मिल गई है। दरभा घाटी की जैवविविधता और प्राकृतिक सुन्दरता को देखते-देखते कब झीरम घाटी आया पता ही नहीं चला। अब दरख्तों और पहाड़ों की सुंदरता की जगह कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेडों के स्मारकों ने मेरा ध्यान खींच लिया जो नेशनल हाईवे के किनारे पर बनाए गए हैं। मैं जब-जब इन स्मारकों को देखता हूं तो नक्सलियों के बारे में सोचने लगता हूं। झीरम गांव कई पारा या टोलों का समूह है। कम से कम तीन टोले तो हाईवे पर ही हैं। यही वह जगह है जहां पर बहुत से बेगुनाह लोग भी नक्सलियों की सनक के शिकार हुए थे। मैं जब-जब झीरम से गुजरता हूं तब-तब कोरकोट्टी-मदनवाड़ा की कसक गहरी हो जाती है जिसमें हमने अपने बेहतरीन कप्तान श्री विनोद चौबे को खो दिया था। यह बहुत बड़ी विभागीय क्षति थी। और जब-जब कोरकोट्टी-मदनवाड़ा की घटना को याद करता हूं तो मुझे झीरम हत्याकांड की भी दुखद याद ताजी हो जाती है। कभी-कभी लगता है कि झीरम कांड(25 मई, 2013) और कोरकोट्टी-मदनवाड़ा कांड(12 जुलाई,2009) एक ही दुखान्त नाटक के दो एपीसोड हैं, हालांकि कि दोनों में देश और काल का लंबा अंतराल है।
21/06/2019

जाति-व्यवस्था

जातिवाद को मैं भारतीय समाज का कलंक मानता हूं। जाति व्यवस्था जन्म के आधार पर भेदभाव का पोषण करती है तथा समाज के कुछ समूहों को बहुत से अधिकारों और सुविधाओं से वंचित रखती है। अगर हिंदुस्तान में जो चीजें या चलन संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ हैं तो उनमें जातिवाद सबसे आगे है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता तथा स्वतंत्रता और अवसर की समता हमारे संविधान के बुनियादी ढांचे की कुछ मुख्य विशेषताएं हैं। जाति व्यवस्था हमारे संविधान की इसी मूल भावना के ठीक विपरीत है। सरल शब्दों में कहें तो जातिप्रथा संविधान के ही खिलाफ है। यह अत्यंत शर्म की बात है कि इसे हम आज भी बर्दाश्त कर रहे हैं, ढो रहे हैं। वैसे अन्य अनेक बातें हैं जिन्हें सभ्य समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता लेकिन जातिप्रथा सबसे अधिक खतरनाक है। जब देश का बहुसंख्यक समुदाय हिंदू ही हजारों टुकड़ों में खंडित है तब फिर हम अव्वल दर्जे की कौमी एकता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
        अब ऐसी बातों का समर्थन करने का दौर नहीं रहा। इसे जड़ से उखाड़ना न केवल जरूरी है बल्कि संभव भी है।
      तुर्की के जननायक अतातुर्क कमाल पाशा ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में अपने देश में व्याप्त दकियानूसी सोच और सभी तरह के कठमुल्लापन को समाप्त कर दिया था। इससे कुछ वर्गों को तकलीफ़ जरूर हुई लेकिन इतिहास में कभी  'यूरोप का मरीज' के नाम से कुख्यात तुर्की आज समृद्ध राष्ट्र है। हमें भी किसी 'युवा तुर्क' का इंतजार है जो देश से घिनौनी सामाजिक बुराइयों को एक झटके में खत्म करने का 'कमाल' कर सके।

डिस्क्लेमर :- कृपया राजनीति प्रेरित टिप्पणी करने से बचें।
27/05/19

नूरा कुश्ती

बारिश कम होती है,
नदी-नालों में उफान ज्यादा होता है।
असल मुद्दे सब गायब हैं;
फालतू बातों पर तूफान ज्यादा होता है।।

हर जगह चलती है नूरा-कुश्ती
दिखावे का घमासान ज्यादा होता है।।

जनहित में कुछ खास कर पाते नहीं,
उल्टा-पुल्टा बयान ज्यादा होता है।।

सहमी-सकुचाई सी रहती है शराफ़त,
शरारत को गुमान ज्यादा होता है।।

बारिश कम होती है,
नदी-नालों में उफान ज्यादा होता है।
असल मुद्दे सब गायब हैं;
फालतू बातों पर तूफान ज्यादा होता है।।
       
                      - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'
                             07/07/2019
                               ग्राम - छीपा
                               राजनांदगांव

© सर्वाधिकार सुरक्षित।