रविवार, 23 दिसंबर 2018

कश्मीर आजकल

कश्मीर-आजकल

छत्तीसगढ़ी कविता
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।

जेन ल अपन लइका समझ के मूँड़ मँ बोहेन
पड़ोसी ल बाप समझ के मेछरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

जेन सेना के नाम से उँकर कका मन थर्राथे
ओकरे ऊपर पथरा बरसावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

माछी समझ के जेन ला नई थपड़ायेन
वो नाक में खुसर के भुनभुनावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

छींक परबो ते उँकर का गत हो ही
ये ला ओमन बिसरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

केसर के कियारी ल खून से झन सींचे
नहीं ते उँकरो बारी आवत हे।
बने चेता दे भईया मंगलू!
ए मन अनते तनते जावत हे।।

सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

       ----किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'।

रविवार, 9 दिसंबर 2018

जब से उनका इजहार आया है

जब से उनका इजहार आया है।
चेहरे पर मेरे निखार आया है।।

खिल-खिल गई हूं मैं, जैसे
पतझड़ में बहार आया है।

मुद्दतों से जिसकी तलाश थी
आज वो दिलदार आया है।

धड़कनों ने  पुकारा था जिसे
नजरों में पहली बार आया है।

मिलेंगे तो जाने न दूंगी
यह खयाल सौ-सौ बार आया है।

जब से उनका इजहार आया है।
चेहरे पर मेरे निखार आया है।।

           -- किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                   03/12/2018
                      कुन्दनपाल

© सर्वाधिकार सुरक्षित

जंग अभी बाकी है

माना कि जिंदगी के अनेक रंग अभी बाकी हैं।
पर वतन के दुश्मनों से जंग अभी बाकी है।

कायदे से टकराते रहे हैं उनसे अब तक
लेकिन निपटने के कुछ ढंग अभी बाकी हैं।

और इम्तिहान न लें हमारे सब्र का
मृत्यु का नृत्य उनके संग अभी बाकी है।

उनके आकाओं को भी जहन्नुम पहुंचाए
वो हुड़दंग अभी बाकी है।।

वतन के दुश्मनों से जंग अभी बाकी है।
माना कि जिंदगी के अनेक रंग अभी बाकी हैं।

                   - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                         04/12/2018
                            कुन्दनपाल

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

बातें न गोल-गोल कर

देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

ऐसे न वक्त जाया कर;
सीधे मुद्दे पर आया कर।
दिल में है वही बताया कर;
नाहक न बातें घुमाया कर।।
खुरदरी बातें भी अच्छी होती हैं;
सपाट न बना छोल-छोल कर।।
देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

तुम्हारी ये झूठी मुस्कान
नहीं छुपा सकती असली पहचान।
चेहरा कुछ और कहता है
जुदा है तेरी जुबान।।
झूठी तारीफों से बेहतर होगा
कि शिकवा करो दिल खोल कर।
देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

                 - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                         09/12/2018
                             कुंदनपाल

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बुधवार, 21 नवंबर 2018

जज़्बात ऐसे उसने जगा दिया।
कि मेरे दिल ने मुझसे दगा किया।।

अब तक खुद पर गुरूर था बहुत
उसने मुझे उसूलों से डिगा दिया।

तन्हा था मैं खुद से पराया भी।
सारे जग का उसने सगा किया।।

उसकी दिल्लगी बहुत रास आई
दर्द सारा उसने भगा दिया।।

22/11/18
कुंदनपाल

रविवार, 21 अक्टूबर 2018

तुम्हारे लिए ही जो सांस लेता है।

तुम्हारे लिए ही जो सांस लेता है।
उसी मुहब्बत का हिसाब लेता है।।

नाहक ना परेशान कर उसे
जो तुम्हें मीठे ख्वाब देता है।

गुणा-भाग से परे होती हैं कुछ बातें
वक्त ही इनका हिसाब देता है।

मुश्किलों को करता है जो आसान
उसी का तू जवाब लेता है।

तुम्हारे लिए ही जो सांस लेता है।
उसी मुहब्बत का हिसाब लेता है।।

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

आतिशबाजी क्यों दिखाती है इस दिवाने को।
एक तुम ही काफी हो दिलों में आग लगाने को।।
बड़ी कातिलाना है तेरी हंसी,
मुस्करा के ही बरबाद कर जाओगी जमाने को।।
कौन बच पाया सोख अदाओं के जादू से,
हर निगाहें आतुर हैं दिल में तेरे समाने को।।
सुन दिल जलाने वाले,
तुम्हें ही आना होगा मरहम लगाने को।।

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2018

जिसके लिए मैं सारी दुनिया से टकरा गया।

जिसके लिए मैं सारी दुनिया से टकरा गया।
उसे दुश्मनों की कतार में पाकर चकरा गया।

अभी तक पीठ पीछे करता रहा  वार वह,
आखिर आज सामने से पकड़ा गया।

बता देते तो हम यूं ही हार मान लेते,
नाहक वह बारूद बिखरा गया।

बहुत कच्चा था मैं दुनियादारी में,
उसका साथ मेरा तजुर्बा निखरा गया।

जतन से सहेजे थे हमने रिश्तों के मोती,
एक झटके में ही वह सब बिखरा गया।
जिसके लिए मैं सारी दुनिया से टकरा गया।
उसे दुश्मनों की कतार में पाकर चकरा गया।

                - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

सलवा जुड़ूम

मई 2005 में कुटरू-फरसेगढ़ से एक जन आंदोलन शुरू हुआ जिसे सलवा जुड़ूम नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम का अर्थ है शांति के लिए संगठन या शांति के लिए युद्ध।पहली नजर में यह नक्सलियों के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों का सशस्त्र युद्ध था।तीर-कमान,कुल्हाड़ी आदि से लैस ये आदिवासी नक्सलियों तथा उनके समर्थकों के सफाये में लग गए।बस्तर के आदिवासियों ने वहाँ की या अपनी सुरक्षा स्वयं अपने हाथ में ले लिया।वे बस्तर के चप्पे चप्पे में लोगों और सामानों की आवाजाही पर नजर रखने लगे।बस्तर के आदिवासी खुदमुख्तार होने लगे थे। 1910 में बस्तर के आदिवासियों ने महान स्थानीय लड़ाका गुंडाधूर के नेतृत्व में अँगरेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था।जिसे भूमकाल नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम अपने सही अंजाम पर पहुँचता तो भूमकाल से भी महान होता।
                     तमाम कमियों,अभावों और कष्टों के बावजूद सलवा जुड़ूम सफलता की ओर अग्रसर था।दरअसल बस्तर में अब तक जो भी बाहरी लोग आए ,लगभग सभी ने आदिवासियों की सरलता का गलत फायदा उठाया।चाहे वे अँगरेज हो या मराठी बंजारे,चाहे बांग्लादेशी शरणार्थी हों,चाहे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हों या चाहे भारत के अन्य भागों में अपराध करके बस्तर के बीहड़ जंगलों में छिपे पापी और चाहे नक्सली ही हों।सबने बस्तर और बस्तरिहों को दोनों हाथों से लूटा। सबने उनकी सिधाई का लाभ उठाया।
                 सलवा जुड़ूम के समय भी बस्तर के आदिवासी छले गए।सबसे पहले महेन्द्र कर्मा ने सलवा जुड़ूम को अपने हाथों में लिया।बस्तर में उनकी अगुवाई या सहभागिता के बिना कोई जन आंदोलन हो उन्हें कैसे मंजूर होता।सोढ़ी देवा नामक काल्पनिक व्यक्ति को सलवा जुड़ूम का सुप्रीम कमांडर बताया।यदि कोई वास्तविक व्यक्ति जुड़ूम का कमांडर इन चीफ होता तो बस्तर के नेताओं की वाट लग जाती।तुरंत आनन फानन में पक्ष विपक्ष एक होकर सलवा जुड़ूम जैसे जन आंदोलन को हथिया लिया।अब जुड़ूम राजनेताओं की दया,शासन की नीतियों और कोर्ट के निर्णयों पर निर्भर कर दिया गया।एक बहुत बड़े जन आंदोलन की धार को असर दिखाने से पहले ही कुंद कर दिया गया।फिर न्यायालय का निर्णय आया कि आम जनता के किसी भी भाग का सशस्त्रीकरण नहीं किया जा सकता।इस तरह जुड़ूम को समाप्त कर दिया गया।आज बस्तर की जनता 2005से भी बदतर हालात में है।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

कलमकार हूं इंकलाब का

गीत लिखूं मैं कैसे तुम्हारे इकबाल का?
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

हां मैं अदना-सा इन्सान हूं;
पर कलम में समाया हुआ तूफान हूं।।
एहसास दिलाना बाकी है दिल में छुपे सैलाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

हर तरफ अशांति है फिर अमन के गीत कैसे गाऊं ?
मैं तो ठहरा सतह का आदमी शिखरों को कैसे गले लगाऊं ‌?
अनगिनत सवालों का पुलिंदा मैं, इंतजार है जवाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

मुझको तेरा कुछ भी नहीं भाता है।
जन-जन से मेरा नाता है।
तारीफ में एक लफ्ज़ नहीं निकलेगा
मैं तो एक पन्ना हूं बगावत की किताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।

सबकी उम्मीदें तार-तार है।
जनता आज जार-जार है।
बागी हुई कलम मेरी, काम नहीं करेगी तुम्हारी ढाल का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

अपनी शानो-शौकत में होकर तुम मशगूल।
लोगों को समझते हो चरणों की धूल।।
कम नहीं आंकना जुगनुओं को
साथ चमकेंगे तो उजाला होगा आफताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

          - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

रविवार, 16 सितंबर 2018

जब से आया है तेरा पैगाम।


जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।
दिन-रात तुम्हें याद करना
इसका बस एक काम।

मन मचलता है
पास तुम्हारे आने को।
दिल है बेकरार
हर खतरा उठाने को।।
भाता नहीं है मुझे
तेरे शिवा कोई नाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।।

खींचा चला आता हूं
तेरी ही ओर।
तू ही है
मेरी चाहत की छोर।।
तुझे पाने की जिद में
भूल जाता हूं अंजाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।।

जब तुमसे बात हुई।
हसीन मुलाकात हुई ।
दिल की जमीं पर
खुशियों की बरसात हुई।।
दिन मेरे उजले हुए
सुहानी हो गई हर शाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।
दिन-रात तुम्हें याद करना
इसका बस एक काम।।

                - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

शनिवार, 15 सितंबर 2018

हमारी दोस्ती में

हमारी दोस्ती में कुछ लोग बड़े काबिल हो गये।
वे रहम दिल और हम रहम के काबिल हो गये।।

जिनकी आंखों से पोंछे थे हमने आंसू कभी,
वे अब हमीं पर हंसने वालों में शामिल हो गए।

पता ही नहीं चला कि कब लूट लिये गये,
हम दोस्ती में इस कदर गाफिल हो गये।

जिन नाउम्मीदों को हमने दिया पनाह,
आज  वो  ही  हमारे  कातिल  हो  गये।

हमारे जिन लफ़्ज़ों की शान से करते थे नकल,
वे भी उनकी नज़र में अब बातिल हो गये।

(बातिल=व्यर्थ)

हमारी दोस्ती में कुछ लोग बड़े काबिल हो गये।
वे रहम दिल और हम रहम के काबिल हो गये।।

                  - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

जो जीता है तुम्हारे लिए

जो जीता है तुम्हारे लिए उसी की जान लेते हो।
सबको अपने जैसा खुदगर्ज क्यों मान लेते हो?

मुहब्बत से ही लूट लोगे सारी दुनिया,
हर किसी से दुश्मनी क्यों ठान लेते हो?

प्यार-मुहब्बत भी कोई चीज होती है यार,
होशियारी को ही सब कुछ क्यों मान लेते हो?

सहज सरल हैं तुम्हारे सभी अपने लोग,
चालाकी और बांकपन का कहां से ज्ञान लेते हो?

हर दिल ने समेट रखा है दर्द का समंदर
उसे खुशियों का सैलाब क्यों मान लेते हो?

जो जीता है तुम्हारे लिए उसी की जान लेते हो।
सबको अपने जैसा खुदगर्ज क्यों मान लेते हो?

                     -किशोरीलाल वर्मा 'कुंदन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित

चुप रहना ही समझदारी का पैमाना हो गया

चुप रहना ही समझदारी का पैमाना हो गया है।
ठहाका   लगाए  मुझे   जमाना हो  गया है।।

न रहीं अब खुशियों से भरी नादानियां,
वक्त से पहले  यह बंदा सयाना हो गया है।

अब दिल की कहां सुनता है दिमाग,
यह भी हमसे बेगाना हो गया है।

जिम्मेदारियों का बढ़ गया है बोझ इतना
कि मुश्किल कदम बढ़ाना हो गया है।

हकीकत बयां करना अब ऐब हो गया,
झूठ और फरेब का जमाना हो गया है।

चुप रहना ही समझदारी का पैमाना हो गया है।
ठहाका   लगाए  मुझे   जमाना हो  गया है।।

              - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

दर्द अपना कह दे

दर्द अपना कह दे मुझे,
बढ़ता है अकेले रोने से।
बांटने से कम होगा बोझ,
थक जाएगा अकेले ढोने से।।

उदास रहना अच्छा नहीं,
कोई खुश होता है तेरे खुश होने से।

सुख-चैन है दिल की असली पूंजी
फर्क नहीं पड़ता चांदी और सोने से।

आ नजरें मिलाकर करले गुफ्तगू
यूं न देख मुझे आंख के कोने से।

दर्द अपना कह दे मुझे,
बढ़ता है अकेले रोने से।
बांटने से कम होगा बोझ
थक जाएगा अकेले ढोने से।।

           - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

रविवार, 2 सितंबर 2018

पढ़े हे फेर कढ़े नइहे

छत्तीसगढ़ी में कहावत है कि,'पढ़े हे फेर कढ़े नइहे' सिर्फ पढ़ने से कुछ नहीं होने वाला। अपने सैद्धांतिक ज्ञान को व्यवहारिक परिस्थितियों में उपादेय बनाने की क्षमता भी होनी चाहिए। हमारे स्कूलों में बहुत से ज्ञान विहीन शिक्षक गुरु बने बैठे हैं और खुद के बच्चों को पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हैं। अंगूठा टेक आदमी विधायक बनकर कानून बना रहा है। हमारे देश के मिनिस्टर और डाक्टर अपना इलाज विदेशों में कराते हैं। जो चौकीदार बनने लायक भी नहीं है वह सिपाही है। नौकरी बहुत है लेकिन उनके लायक लोगों की कमी है। और जो काबिल हैं उनको चार-चार, पांच-पांच नौकरियां भी लग जाती हैं।

मंगलवार, 28 अगस्त 2018

मेरा भारत महान।

मेरा भारत महान।
जिसने भी यह नारा दिया वह बहुत ही बड़ी और अच्छी सोच वाला व्यक्ति था। मेरा भारत अर्थात मेरे सपनों का भारत, मेरी उम्मीदों का हिंदुस्तान, मेरे हिस्से का भारत; जिसमें मैं अपने विचारों और कर्मों से गढ़ना चाहता हूं उसे निश्चित रूप से महान होना चाहिए। यह वाक्य एक नागरिक (चाहे आम हो या खास) की आशाओं और आकांक्षाओं के साथ ही उसके कर्त्तव्यों की ओर भी इंगित करता है। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान देश की जनता ने महान आदर्शों और आकांक्षाओं से अनुप्राणित होकर आजादी को हासिल करने के लिए घोर कष्ट सहे और बड़े से बड़े त्याग किए। मरण से भी कष्टकारी जेल की यातनाएं सहीं और आत्म बलिदान किए। असंख्य लोगों ने स्वतंत्रता की बलि वेदी पर हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दी। महान् त्याग और अपरिमित कष्टों के बाद हमें यह अमूल्य आजादी मिल पायी है इसलिए हर परिस्थिति में इसे सफल बनाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। आमतौर पर हम अपनी अब तक की उपलब्धियों से असंतुष्ट रहते हैं। लेकिन इसका एक अर्थ यह भी है कि जैसे-जैसे देश प्रगति करते जाता है लोगों की उम्मीदें बढ़ती जाती हैं। आजादी की प्राप्ति के बाद हमारे करोड़ों मजदूरों और किसान भाइयों ने अपना पसीना बहाया है। हजारों वैज्ञानिकों और प्रशासकों ने तथा लाखों बुद्धिजीवियों ने अपना भेजा खपाया है। इसलिए अगर हम यह कह दें कि देश ने इतने वर्षोंं में कुछ भी उन्नति नहीं किया तो उनकी मेहनत का अपमान होगा। लेकिन यह भी सही है कि अनेक कमियां रह गई हैं। जितना होना चाहिए उतना नहीं हो पाया। परन्तु हर किसी पर दोष मढ़ने से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। तमाम कमियों के बावजूद हमारे देश ने काफी तरक्की की है और हम अपने अतीत के साथ-साथ वर्तमान पर भी गर्व कर सकते हैं। हमें अपने देश की मिली-जुली संस्कृति पर अभिमान रहेगा।

जय हिन्द!
जय भारत!!
मेरा भारत महान!!!

बिना मतलब के भी आया कर।

मुझे  परखने में  यूं  न वक्त जाया कर।
बिना मतलब के भी कभी आया कर।।

पूरे जमाने को मालूम है तेरी फितरत,
मुझ से  कुछ  भी  न   छुपाया   कर।

दूसरों की भूल पर हंसने  वाले, कभी
खुद की गलतियों पर मुस्कराया कर।

बड़े नाज़ुक दिल होते हैं कुछ लोग,
जब  जी  चाहे  न आजमाया कर।

मुझे परखने में यूं न वक्त जाया कर।
बिना मतलब के भी कभी आया कर।।

                  - किशोरी लाल वर्मा

शनिवार, 28 जुलाई 2018

ईश्वर

कुछ लोग कहते हैं कि भगवान है। कुछ अन्य लोग कहते हैं कि भगवान नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि भगवान ऐसा है। कुछ अन्य लोग कहते हैं कि भगवान वैसा है। वह भी क्या भगवान  जिसे लोग ऐसा है बोल दें, वैसा है बोल दें। अगर भगवान है तो भी उसे ऐसा है या वैसा है नहीं बोल सकते। हमारी बुद्धि के कुछ सांचों में ढल कर ही हमें विश्व का ज्ञान मिलता है। बैल का दिमाग इन्सानी दिमाग से अलग है। उसके दिमाग में उतने अच्छे सांचें या केटगरी नहीं हैं जितने अच्छे इंसान के दिमाग में हैं। मतलब हम उतना ही समझ सकते हैं जितनी हमारी बुद्धि की सीमा है। लेकिन हमारे पास केवल पांच इंद्रियां हैं। हम केवल इनके विषय को ही जान सकते हैं। हमें जो वस्तु दिखाई देता है वह स्वयं में जो वस्तु है उससे बहुत ही कम है यानी हम किसी वस्तु को उसकी सम्पूर्णता में कभी नहीं जान पाते। हम किसी वस्तु के केवल कुछ गुणों को ही जान सकते हैं, उसके सभी गुणों को नहीं क्योंकि इस बात की बहुत ही ज्यादा संभावना है कि वस्तुओं में और भी बहुत से गुण धर्म होंगे लेकिन उन गुणों को विशेषताओं को हमारी बुद्धि तक पहुंचाने वाली इंद्रियां ही नहीं है।
दरअसल परमतत्व केवल एक है जिसे शंकराचार्य ने अद्वैत कहा है । वास्तव में व्यवहारिक रूप में और व्यवहारिक तरीके से ईश्वर को जाना ही नहीं जा सकता क्योंकि वह इस व्यवहारिक प्रपंच से परे है। ईश्वर को समझने के लिए व्यवहारिक बुद्धि अक्षम है। उसके लिए हमें पारमार्थिक होना होगा।

शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

नमक की बोरी में दाल का एक दाना

कुछ लोग बेहतरीन होते हैं। अपनी अतिरिक्त अच्छाइयों की वजह से सिस्टम के ढाँचे में फिट नहीं हो पाते। उनकी वैसी हालत होती है जैसी हालत नमक की बोरी में पड़े हुए दाल के कुछ दानों की होती है। ऐसे में व्यक्ति यह सोच बनाने लगता है कि मेरे अंदर भी थोड़ा सा भी कमीनापन होता तो शायद मैं बेहतर स्थिति में होता। गैरों से लड़ने के लिएे हमें तैयार किया गया है। परंतु मैं खुद को अपने ही लोगों के विरुद्ध पाता हूँ। मेरे अपने ही मेरे खिलाफ समस्त कुतर्कों के साथ खड़े हैं। बार-बार ऐसा लगता है कि मेरी कमजोरी ही समस्या की जड़ है। सबसे बड़ी कमजोरी है इंसानियत। इंसानियत का झंडा हाथ में लेकर तोप से टकराना है।
                       अच्छाई के पैमाने तेजी से बदल रहे हैं। मुझे आशंका है कि भविष्य में कहीं दूसरे प्रकार के लोग अच्छे न मान लिए जाएँ।

हिमादास

फिनलैंड में हिमादास ने 400 मीटर दौड़ में इतिहास रच दिया। लेकिन उनको उस तरह का सम्मान, पुरस्कार और वाहवाही नहीं मिली जिस प्रकार क्रिकेटरों या अन्य खेलों के खिलाड़ियों को दिया जाता है। इतिहास में कभी कभी ऐसा भी होता है कि हिमा जैसी शख्सियत  सिस्टम के किसी हिस्से के योगदान के बिना भी ऊंचाइयों पर पहुंच जाती हैं। और यह बात भी उन लोगों के लिए  तकलीफ़देह होती है जो खेलतंत्र पर कब्जा जमाए बैठे हुए हैं। तामझाम वाली कोचिंग के बिना ही सुदूर पूर्व की अत्यंत साधारण ग्रामीण-बाला कैसे विश्वविजयिता बन गई? यह उनके पेट में दर्द का भी एक कारण है। हिमादास की सफलता ने द्रोणाचार्यों का हाजमा खराब कर दिया है। दरअसल हमारे देश और विदेशों में भी एकलव्यों को कभी भी वाजिब सम्मान नहीं मिला। विनोद गनपत कांबली में सचिन रमेश तेंदुलकर से ज्यादा प्रतिभा थी लेकिन क्रिकेट के द्रोणाचार्य रमाकांत आचरेकर का आशीर्वाद तेंदुलकर के साथ था। बात यहीं तक खतम नहीं हो जाती। आज के बाजारीकरण के दौर में गुरु-परम्परा को भी हतोत्साहित किया जाता है। ओडिशा का गरीब बालक बुधिया आप सबको याद ही होगा। उसके गुरु बिरंचीदास की हत्या कर दी गई। हिमादास को पहचान कर फुटबाल के खेल से एथलीट की ओर मोड़ने वाले निपुन दास ही हैं। लेकिन उनको प्रचारित नहीं किया गया क्योंकि इनकी कार्य प्रणाली आर्थिक लूट-खसोट और भेदभाव पर आधारित खेल अकादमियों के खिलाफ है। इसी कारण सद्गुरुओं को द्रोणाचार्य बनने नहीं दिया जाता।
बात हिमादास से शुरू हुई थी। वास्तव में हिमा दास की पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व विज्ञापन और प्रचार पर आधारित बाजारवाद से मेल नहीं खाते। उसे विश्व चैंपियन बनने के लिए दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता आदि महानगरों में महंगे खेल अकादमियों में प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ी। उसे किसी नामचीन कोच की भी जरूरत नहीं पड़ी। चावल से बने भात खा कर फिनलैंड की धरती पर तिरंगा लहराने वाली लड़की से नामी-गिरामी ब्रांडो के प्रोटीन पाउडर और एनर्जी बूस्टर का विज्ञापन कैसे हो पाएगा ? अत्यंत साधारण नाकनक्श वाली श्यामवर्णी बालिका से सौंदर्य उत्पादनों का विज्ञापन वे लोग कैसे करा पाएंगे? यह बाजार से जुड़े हुए लोगों की समस्या है। लेकिन देश की आम जनता हिमा दास की सफलता से गदगद है। असम में धान की खेतों के कीचड़ में खिला कमल आज पूरे देश की शोभा बन चुका है। हम गुरु निपुन दास को प्रणाम करते हैं जो तमाम बाधाओं को पार कर हिमा जैसी प्रतिभा को बिना किसी स्वार्थ के दुनिया के सामने ले आए।

नापाक पाकिस्तान

अँगरेजों के कुकृत्यों के फलस्वरूप हिन्दुस्तान के गर्भ में एक नाजायज बच्चा पलने लगा था।पैदा होने के पहले ही उस नापाक का नाम पाकिस्तान रख लिया गया।अँगरेजों ने उसे दुनिया में जल्दी लाने के लिए सीजर द्वारा समय पूर्व पैदा करा दिया।भारत का चीर-फाड़ करके पाकिस्तान को दुनिया में लाया गया। भारत देश दर्द से कराह उठा।उसकी चीख केवल महात्मा गांधी सुन पा रहे थे। बाकी नेता तो हिन्दुस्तान की आजादी से एक दिन पहले 14 अगस्त को ही पाकिस्तान की आजादी को स्वीकार कर लिए थे क्योंकि वे सत्ता में भागीदारी पाने के लिए उतावले थे।
                           पाकिस्तान की मनोदशा में वो तमाम कमियाँ है जो एक 'नाजायज औलाद' और 'प्रीमैच्योर बेबी' में होती हैं। पाकिस्तान भारत को कोसते और भारत के सिर में मूतते हुए पैदा हुआ था और आज भी यही कर रहा है।
                    पाकिस्तान में सियासत के लिए एक ही काबिलियत जरूरी है कि हिन्दुस्तान को कोसना,गाली देना,भारत का विरोध करना।वहाँ सत्ता में टिके रहने के लिए लगातार राग-कश्मीर अलापना बेहद जरूरी है।
                       यह राग पाकिस्तानी अवाम को कितना अच्छा लगता है यह तो मालूम नहीं परंतु वहां की फौज को बहुत हीअच्छा लगता है क्योंकि कि उसे मार खाने की आदत जो हो गयी है।सन् 1948,1965,1971 और 1999 चारो बार भारतीय सेना के सामने (ना)पाकी फौज या तो चित हो गयी या पीठ दिखा के भागी है।
                      मजे की बात है कि हमने उन्हें चार बार नहीं हजारों बार क्षमा किया।परंतु मान लीजिए पाकिस्तान लड़ाई में यदि धोखे से भी एक बार भी जीत गया तो क्या होगा?क्या वे हमें छोड़ देंगे जैसे हमने उन्हें बाइज्जत जाने दिया?नहीं ना।पाकिस्तानी हुक्मरान मुहम्मद गोरी,महमूद गजनवी और औरंगजेब की परंपरा के हिमायती हैं।आप बखूबी समझ सकते हैं कि वैसी स्थित में अंजाम कितना भयंकर होगा।
             चारों बार हमारी जीत हुई फिर भी हमारी जमीन के कुछ हिस्से पर उनका कब्जा है। इसलिए यदि मौका मिलता है तो ऐसा सबक सिखाना जरूरी हो जाता है कि पाकिस्तान अगले हजार साल तक कश्मीर का नाम भूल कर बलूचिस्तान को याद करता रहे।
                        जय हिन्द।
                        जय भारत।।