छत्तीसगढ़ी में कहावत है कि,'पढ़े हे फेर कढ़े नइहे' सिर्फ पढ़ने से कुछ नहीं होने वाला। अपने सैद्धांतिक ज्ञान को व्यवहारिक परिस्थितियों में उपादेय बनाने की क्षमता भी होनी चाहिए। हमारे स्कूलों में बहुत से ज्ञान विहीन शिक्षक गुरु बने बैठे हैं और खुद के बच्चों को पब्लिक स्कूल में पढ़ाते हैं। अंगूठा टेक आदमी विधायक बनकर कानून बना रहा है। हमारे देश के मिनिस्टर और डाक्टर अपना इलाज विदेशों में कराते हैं। जो चौकीदार बनने लायक भी नहीं है वह सिपाही है। नौकरी बहुत है लेकिन उनके लायक लोगों की कमी है। और जो काबिल हैं उनको चार-चार, पांच-पांच नौकरियां भी लग जाती हैं।
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