कुछ लोग कहते हैं कि भगवान है। कुछ अन्य लोग कहते हैं कि भगवान नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि भगवान ऐसा है। कुछ अन्य लोग कहते हैं कि भगवान वैसा है। वह भी क्या भगवान जिसे लोग ऐसा है बोल दें, वैसा है बोल दें। अगर भगवान है तो भी उसे ऐसा है या वैसा है नहीं बोल सकते। हमारी बुद्धि के कुछ सांचों में ढल कर ही हमें विश्व का ज्ञान मिलता है। बैल का दिमाग इन्सानी दिमाग से अलग है। उसके दिमाग में उतने अच्छे सांचें या केटगरी नहीं हैं जितने अच्छे इंसान के दिमाग में हैं। मतलब हम उतना ही समझ सकते हैं जितनी हमारी बुद्धि की सीमा है। लेकिन हमारे पास केवल पांच इंद्रियां हैं। हम केवल इनके विषय को ही जान सकते हैं। हमें जो वस्तु दिखाई देता है वह स्वयं में जो वस्तु है उससे बहुत ही कम है यानी हम किसी वस्तु को उसकी सम्पूर्णता में कभी नहीं जान पाते। हम किसी वस्तु के केवल कुछ गुणों को ही जान सकते हैं, उसके सभी गुणों को नहीं क्योंकि इस बात की बहुत ही ज्यादा संभावना है कि वस्तुओं में और भी बहुत से गुण धर्म होंगे लेकिन उन गुणों को विशेषताओं को हमारी बुद्धि तक पहुंचाने वाली इंद्रियां ही नहीं है।
दरअसल परमतत्व केवल एक है जिसे शंकराचार्य ने अद्वैत कहा है । वास्तव में व्यवहारिक रूप में और व्यवहारिक तरीके से ईश्वर को जाना ही नहीं जा सकता क्योंकि वह इस व्यवहारिक प्रपंच से परे है। ईश्वर को समझने के लिए व्यवहारिक बुद्धि अक्षम है। उसके लिए हमें पारमार्थिक होना होगा।
शनिवार, 28 जुलाई 2018
ईश्वर
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
नमक की बोरी में दाल का एक दाना
कुछ लोग बेहतरीन होते हैं। अपनी अतिरिक्त अच्छाइयों की वजह से सिस्टम के ढाँचे में फिट नहीं हो पाते। उनकी वैसी हालत होती है जैसी हालत नमक की बोरी में पड़े हुए दाल के कुछ दानों की होती है। ऐसे में व्यक्ति यह सोच बनाने लगता है कि मेरे अंदर भी थोड़ा सा भी कमीनापन होता तो शायद मैं बेहतर स्थिति में होता। गैरों से लड़ने के लिएे हमें तैयार किया गया है। परंतु मैं खुद को अपने ही लोगों के विरुद्ध पाता हूँ। मेरे अपने ही मेरे खिलाफ समस्त कुतर्कों के साथ खड़े हैं। बार-बार ऐसा लगता है कि मेरी कमजोरी ही समस्या की जड़ है। सबसे बड़ी कमजोरी है इंसानियत। इंसानियत का झंडा हाथ में लेकर तोप से टकराना है।
अच्छाई के पैमाने तेजी से बदल रहे हैं। मुझे आशंका है कि भविष्य में कहीं दूसरे प्रकार के लोग अच्छे न मान लिए जाएँ।
हिमादास
फिनलैंड में हिमादास ने 400 मीटर दौड़ में इतिहास रच दिया। लेकिन उनको उस तरह का सम्मान, पुरस्कार और वाहवाही नहीं मिली जिस प्रकार क्रिकेटरों या अन्य खेलों के खिलाड़ियों को दिया जाता है। इतिहास में कभी कभी ऐसा भी होता है कि हिमा जैसी शख्सियत सिस्टम के किसी हिस्से के योगदान के बिना भी ऊंचाइयों पर पहुंच जाती हैं। और यह बात भी उन लोगों के लिए तकलीफ़देह होती है जो खेलतंत्र पर कब्जा जमाए बैठे हुए हैं। तामझाम वाली कोचिंग के बिना ही सुदूर पूर्व की अत्यंत साधारण ग्रामीण-बाला कैसे विश्वविजयिता बन गई? यह उनके पेट में दर्द का भी एक कारण है। हिमादास की सफलता ने द्रोणाचार्यों का हाजमा खराब कर दिया है। दरअसल हमारे देश और विदेशों में भी एकलव्यों को कभी भी वाजिब सम्मान नहीं मिला। विनोद गनपत कांबली में सचिन रमेश तेंदुलकर से ज्यादा प्रतिभा थी लेकिन क्रिकेट के द्रोणाचार्य रमाकांत आचरेकर का आशीर्वाद तेंदुलकर के साथ था। बात यहीं तक खतम नहीं हो जाती। आज के बाजारीकरण के दौर में गुरु-परम्परा को भी हतोत्साहित किया जाता है। ओडिशा का गरीब बालक बुधिया आप सबको याद ही होगा। उसके गुरु बिरंचीदास की हत्या कर दी गई। हिमादास को पहचान कर फुटबाल के खेल से एथलीट की ओर मोड़ने वाले निपुन दास ही हैं। लेकिन उनको प्रचारित नहीं किया गया क्योंकि इनकी कार्य प्रणाली आर्थिक लूट-खसोट और भेदभाव पर आधारित खेल अकादमियों के खिलाफ है। इसी कारण सद्गुरुओं को द्रोणाचार्य बनने नहीं दिया जाता।
बात हिमादास से शुरू हुई थी। वास्तव में हिमा दास की पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व विज्ञापन और प्रचार पर आधारित बाजारवाद से मेल नहीं खाते। उसे विश्व चैंपियन बनने के लिए दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता आदि महानगरों में महंगे खेल अकादमियों में प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ी। उसे किसी नामचीन कोच की भी जरूरत नहीं पड़ी। चावल से बने भात खा कर फिनलैंड की धरती पर तिरंगा लहराने वाली लड़की से नामी-गिरामी ब्रांडो के प्रोटीन पाउडर और एनर्जी बूस्टर का विज्ञापन कैसे हो पाएगा ? अत्यंत साधारण नाकनक्श वाली श्यामवर्णी बालिका से सौंदर्य उत्पादनों का विज्ञापन वे लोग कैसे करा पाएंगे? यह बाजार से जुड़े हुए लोगों की समस्या है। लेकिन देश की आम जनता हिमा दास की सफलता से गदगद है। असम में धान की खेतों के कीचड़ में खिला कमल आज पूरे देश की शोभा बन चुका है। हम गुरु निपुन दास को प्रणाम करते हैं जो तमाम बाधाओं को पार कर हिमा जैसी प्रतिभा को बिना किसी स्वार्थ के दुनिया के सामने ले आए।
नापाक पाकिस्तान
अँगरेजों के कुकृत्यों के फलस्वरूप हिन्दुस्तान के गर्भ में एक नाजायज बच्चा पलने लगा था।पैदा होने के पहले ही उस नापाक का नाम पाकिस्तान रख लिया गया।अँगरेजों ने उसे दुनिया में जल्दी लाने के लिए सीजर द्वारा समय पूर्व पैदा करा दिया।भारत का चीर-फाड़ करके पाकिस्तान को दुनिया में लाया गया। भारत देश दर्द से कराह उठा।उसकी चीख केवल महात्मा गांधी सुन पा रहे थे। बाकी नेता तो हिन्दुस्तान की आजादी से एक दिन पहले 14 अगस्त को ही पाकिस्तान की आजादी को स्वीकार कर लिए थे क्योंकि वे सत्ता में भागीदारी पाने के लिए उतावले थे।
पाकिस्तान की मनोदशा में वो तमाम कमियाँ है जो एक 'नाजायज औलाद' और 'प्रीमैच्योर बेबी' में होती हैं। पाकिस्तान भारत को कोसते और भारत के सिर में मूतते हुए पैदा हुआ था और आज भी यही कर रहा है।
पाकिस्तान में सियासत के लिए एक ही काबिलियत जरूरी है कि हिन्दुस्तान को कोसना,गाली देना,भारत का विरोध करना।वहाँ सत्ता में टिके रहने के लिए लगातार राग-कश्मीर अलापना बेहद जरूरी है।
यह राग पाकिस्तानी अवाम को कितना अच्छा लगता है यह तो मालूम नहीं परंतु वहां की फौज को बहुत हीअच्छा लगता है क्योंकि कि उसे मार खाने की आदत जो हो गयी है।सन् 1948,1965,1971 और 1999 चारो बार भारतीय सेना के सामने (ना)पाकी फौज या तो चित हो गयी या पीठ दिखा के भागी है।
मजे की बात है कि हमने उन्हें चार बार नहीं हजारों बार क्षमा किया।परंतु मान लीजिए पाकिस्तान लड़ाई में यदि धोखे से भी एक बार भी जीत गया तो क्या होगा?क्या वे हमें छोड़ देंगे जैसे हमने उन्हें बाइज्जत जाने दिया?नहीं ना।पाकिस्तानी हुक्मरान मुहम्मद गोरी,महमूद गजनवी और औरंगजेब की परंपरा के हिमायती हैं।आप बखूबी समझ सकते हैं कि वैसी स्थित में अंजाम कितना भयंकर होगा।
चारों बार हमारी जीत हुई फिर भी हमारी जमीन के कुछ हिस्से पर उनका कब्जा है। इसलिए यदि मौका मिलता है तो ऐसा सबक सिखाना जरूरी हो जाता है कि पाकिस्तान अगले हजार साल तक कश्मीर का नाम भूल कर बलूचिस्तान को याद करता रहे।
जय हिन्द।
जय भारत।।