शनिवार, 28 जुलाई 2018

ईश्वर

कुछ लोग कहते हैं कि भगवान है। कुछ अन्य लोग कहते हैं कि भगवान नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि भगवान ऐसा है। कुछ अन्य लोग कहते हैं कि भगवान वैसा है। वह भी क्या भगवान  जिसे लोग ऐसा है बोल दें, वैसा है बोल दें। अगर भगवान है तो भी उसे ऐसा है या वैसा है नहीं बोल सकते। हमारी बुद्धि के कुछ सांचों में ढल कर ही हमें विश्व का ज्ञान मिलता है। बैल का दिमाग इन्सानी दिमाग से अलग है। उसके दिमाग में उतने अच्छे सांचें या केटगरी नहीं हैं जितने अच्छे इंसान के दिमाग में हैं। मतलब हम उतना ही समझ सकते हैं जितनी हमारी बुद्धि की सीमा है। लेकिन हमारे पास केवल पांच इंद्रियां हैं। हम केवल इनके विषय को ही जान सकते हैं। हमें जो वस्तु दिखाई देता है वह स्वयं में जो वस्तु है उससे बहुत ही कम है यानी हम किसी वस्तु को उसकी सम्पूर्णता में कभी नहीं जान पाते। हम किसी वस्तु के केवल कुछ गुणों को ही जान सकते हैं, उसके सभी गुणों को नहीं क्योंकि इस बात की बहुत ही ज्यादा संभावना है कि वस्तुओं में और भी बहुत से गुण धर्म होंगे लेकिन उन गुणों को विशेषताओं को हमारी बुद्धि तक पहुंचाने वाली इंद्रियां ही नहीं है।
दरअसल परमतत्व केवल एक है जिसे शंकराचार्य ने अद्वैत कहा है । वास्तव में व्यवहारिक रूप में और व्यवहारिक तरीके से ईश्वर को जाना ही नहीं जा सकता क्योंकि वह इस व्यवहारिक प्रपंच से परे है। ईश्वर को समझने के लिए व्यवहारिक बुद्धि अक्षम है। उसके लिए हमें पारमार्थिक होना होगा।

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