गुरुवार, 7 मई 2020

बहरों को आवाज मत दो

बहरों को आवाज मत दो।

भाई! आपने हम लोगों को गूंगे समझ लिया इसमें आपकी कोई खता नहीं है। सब को पता है कि हम अपनी खुद की तकलीफों पर भी नहीं बोलते। कभी हम अपने दर्द की परतें नहीं खोलते। पर राज की बात बताऊं कि हम कभी गूंगे नहीं रहे। आपने हमें गूंगे जान कर हमारी आवाज बनने की कोशिश की इसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। हमारा गूंगापन हमारी कमजोरी की निशानी कतई नहीं है। और हां। हमारे दर्द को आप आवाज भी दे दोगे तो भी कोई फायदा नहीं क्योंकि जिन्हें सुनना है वे बहरे हैं। पूरी तरह से तो बहरे नहीं हैं क्योंकि अपने मतलब की हर बात अच्छी तरह सुन लेते हैं। लेकिन जो उनके मतलब का नहीं उस बारे में तो कुछ भी नहीं सुन पाते। तो भाई! आप हमारी मजबूरी के गूंगापन पर तरस खाए इसके लिए फिर से धन्यवाद! लेकिन ये बहरे जरा भी नहीं सुनेंगे चाहे आप कितना भी ऊंचा बोलें। इसलिए मेरे बंधु! बहरों को आवाज मत दो।

                    ‌         - 'कुन्दन'

चाटुकारों की कसम

चाटुकारों की कसम!
छुटभैय्यों की सौगंध!!
मेरा राजनीति से उस तरह का कोई लेना देना नहीं है
जैसा मतलब इसमें बिलबिला रहे कीड़े निकालते हैं।
किसी की हार-जीत से मेरा मतलब है सिर्फ उतना।
एक सामान्य मतदाता का वास्ता रहता है जितना।
वर्ना मेरे खानदान में आज तक किसी ने किसी भी दल के एक भी भौंकने वाले प्राणी को तवज्जो देने की जरूरत ही नहीं समझी।

मैं पूरी तरह गैर राजनैतिक व्यक्ति हूं
मुझे राजनीति से उतनी ही नफरत है
जितना इनको जनता से लगाव है
उस जनता से दिखावे की लगाव
जो सत्ता हासिल करते तक ही इनके लिए जनार्दन होती है।

किसी की जी हुजूरी न करना मेरी निस्संगता की निशानी भी तो हो सकती  है
लेकिन
हवा में छोड़े गए हर तीर को खुद पर लेने के आदी लोग इसे अपनी मुखालिफत समझते हैं।

दरअसल इस या उस दल के लिए मेरी कोई प्रतिबद्धता नहीं है।
मेरे लिए वे सब आवश्यक बुराई हैं।
न तो इनके बिना रह सकते
और न इनके साथ रह सकते।
इसलिए हमें चुनना होता है उसे जो तुलनात्मक रूप से कम खराब दिखता है।
आम मतदाता की तरह मुझे भी इनसे कम या ज्यादा मात्रा में घृणा है।

न कभी किसी दल की सदस्यता ली।
न कभी  स्वामिभक्ति का पट्टा गले में बांधा ।
न किसी जुलुस में झंडाबरदार था।
न किसी यूनियन सदस्य रहा।

जब मैं खुद के लिए भी गूंगा हूं तो फिर दूसरों की आवाज कैसे बन सकता हूं?
लेकिन मेरी एक कमजोरी है
बस एक यही खता है
कि कभी-कभी मैं अपनी कविता को गालियों से भी सजाता हूं
और फिर उसे जोर से उछालता हूं
जूते की मानिंद।

             - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                     11/04/2020
 
                          सुकमा

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रविवार, 3 मई 2020

हेमलेट

हेमलेट शेक्सपियर का एक उत्कृष्ट नाटक है। इसमें एक करैक्टर है क्लाडियस। वह अपने बड़े भाई को जहर दे कर मार देता है तथा उसकी जगह स्वीडन का सम्राट बन जाता है। जल्दी ही अपनी विधवा भाभी से शादी भी कर लेता है। उधर दिवंगत सम्राट के पुत्र राजकुमार हेमलेट को पता चल जाता है कि उसके पिता को उसके चाचा और अब सौतेले पिता क्लाडियस ने मारा है। हेमलेट प्रतिशोध और कुंठा की अग्नि में जलता रहता है। वह क्लाडियस को मारना चाहता है। क्लाडियस इस बात को जानता भी है। लेकिन जनता का समर्थन हेमलेट के साथ है। अतः जनता में विद्रोह न भड़क जाए इसलिए नया सम्राट चाहकर भी हेमलेट को सीधे सीधे नुकसान नहीं पहुंचा पाता। लेआर्टस फ्रांस का राजकुमार है। उसका पिता पालोनिअस क्लाडियस का मंत्री था। पालोनिअस को हेमलेट क्लाडियस के धोखे में मार देता है। पालोनिअस की बेटी और फ्रांस की राजकुमारी अफोलिया हेमलेट से प्यार करती थी। वह अपने पिता की मृत्यु तथा हेमलेट के प्रेम में पागल हो जाती है। वह झरने में गिर कर मर जाती है। इन कारणों से लेआर्टस हेमलेट से बदला लेने की सोचता है। क्लाडियस इसे हेमलेट की हत्या कराने के अवसर के रूप में बदला चाहता हूं। लेआर्टस हेमलेट को तलवार युद्ध के लिए ललकारता है। जो विषबुझी तलवार हेलमेट को मारने के लिए थी वह धोखे से लेआर्टस के लिए इस्तेमाल हो जाती है और वह मारा जाता है। द्वंद्वयुद्ध में जीतने की खुशी के बहाने जहरीली शराब से हेलमेट को मारने का फिर षड्यंत्र किया जाता है लेकिन इस बार भी हेमलेट बच जाता है।  जहरीली शराब क्लाडिअस को पीना पड़ जाता है।
            कहानी सीधी और सपाट नहीं है। इसमें नाटकीयता और उतार चढ़ाव काफी है।
       चरित्र चित्रण कमाल का है। घटनाओं और संवादों के माध्यम से विभिन्न पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को बखूबी उभारा गया है। पात्रों में प्रेम, कुंठा, प्रतिशोध आदि मनोभावों के चित्रण में नाटककार को महारत हासिल है।
            तत्कालीन परंपराओं, विश्वासों और रूढ़ियों के द्वारा तथा घटनाओं के आलोक में देश और काल का सम्यक निरूपण हो पाया है।