गुरुवार, 14 नवंबर 2019

न मैं शोहरत चाहूं

न मैं शोहरत चाहूं, न मुझे होशियारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

मूंछों पर मैं ताव दूंगा।
दुश्मनों को घाव दूंगा।।
सिर्फ देश के लिए दिल धड़के ऐसी बेकरारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

हिमालय से मुश्किल रस्ता हो।
सामने चाहे टैंक-दस्ता हो।।
कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ने की जिम्मेदारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

अमन की हिफाजत करूंगा।
आखिरी सांस तक मैं लड़ूंगा।।
देशहित में मर मिटने की मेरी बारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

न मैं शोहरत चाहूं, न मुझे होशियारी दे।
मेरे मालिक मुझे वतन की पहरेदारी दे।।

                 - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                        26/08/2019
               मुरागांव छावनी, जिला-कांकेर

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सच में तेरा आना होगा?

सच में तेरा आना होगा?
या फिर नया बहाना होगा??

आकर कुछ ठहरोगे भी
कि आते ही जाना होगा?

मेरे जज़्बात की कदर न सही
अपनी पसंदगी तो बताना होगा।

तुमसे है कितनी मुहब्बत
क्या यह भी जताना होगा?

फब्तियों के तीर चला लेना
मेरा दिल फिर निशाना होगा।

तू नहीं, तेरा इन्तजार ही सही;
रिश्ता तो मुझे निभाना होगा।

सच में तेरा आना होगा?
या फिर नया बहाना होगा??

           - किशोरी लाल वर्मा'कुन्दन'
                  11/09/2019
                   मुरागांव, कांकेर

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जिंदगी की परीक्षा

न सिलेबस दिखाती है, न समय दे जाती है।
जब तेरा जी चाहता है, जिंदगी! तू आजमाती है।।

कब तक खरा उतर पाऊंगा तेरी परीक्षाओं में;
हर बार पहले से भी कठिन सवाल उठाती है।।

औरों को बख्श देती है नाकाबिल समझकर;
मेरे लिए ही नई नई चुनौतियां लेकर आती है।।

मुझे तराशने में क्यों हो तुम इतना मशगूल ?
इस अदने से इंसान पर  तरस नहीं खाती है।।

न सिलेबस दिखाती है, न समय दे जाती है।
जब तेरा जी चाहता है जिंदगी! मुझे आजमाती है।।

           -- किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                    21/09/2019
                मुरागांव, कोरर, कांकेर

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कोई कसर ना छोड़ी

कोई कसर नहीं छोड़ी नामुरादों ने।
पर हार नहीं मानी मेरे इरादों ने।।

फाकामस्ती में मशगूल था मैं
पर बुरा मान लिए रईसजादों ने।

फकीरी में भी इतना खुश था
कि दुश्मनी ठान ली शहजादों ने।

तोपों से टकराने का हुनर  था
लेकिन घेर लिए मुझे प्यादों ने।

मनचाहे आकार में ढाल न सके मुझे
जवाब दे दिए उनके खरादों ने।

दिलों में उनके जैसे आग ही लग गई
जब हंस कर उन्हें देखे मेरे बुरादों ने।

मेरी शालीन मौत से भी जल-भून गये
जब मेरे लिए आंसू बहाए जल्लादों ने।

कोई कसर नहीं छोड़ी नामुरादों ने।
पर हार नहीं मानी मेरे इरादों ने।।

      - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
              28/09/2019
          नगरी, जिला - धमतरी

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पिता जी!

पिता!
ओ मेरे पिताजी!!
अब आपके कंधे झुके हुए हैं;
वे कंधे
जो कभी
काफी मजबूत होते थे।
जिन पर मुझे बिठा कर
गांव की गलियों में घंटों घुमाया करते थे।
खेतों की हरियाली
और
फसलों की बाली दिखाते।
कभी तालाब के शांत-स्वच्छ जल में
मछलियों की कलाबाजी दिखाते।
कभी नदी किनारे ले जाते
तो कभी बगीचों की सैर कराते।
मेरे देव!
मुझे अपने सिर पर फूल समझ कर चढ़ाए रहते
और मैं खुद को दूसरों से ऊंचा समझ कर
उनके बौनेपन पर हंसता था।
न आपके तन में थकान होती थी
और न चेहरे पर चिंता के निशान होते थे।
मेरी एकरसता भंग करने के लिए
मुझे अपने हाथों से
इस कंधे से उस कंधे पर ले जाते थे;
उन हाथों से
जो बहुत मजबूत और सक्षम होते थे।
उन्हीं हाथों से
मेरे पसंदीदा आम के पेड़ की फुनगी से भी
फल गिराते थे।
मेरी एक इच्छा पर
बाड़ी में अमरूद के पेड़ पर दौड़ कर चढ़ जाते थे।
अपने मजबूत दांतों से
गन्ने निस कर सभी भाई-बहनों को खिलाते थे।
भरी गरमी में नदी की रेत में
तुरंत झिरिया खोद कर पानी पिलाते थे।
सीना जो कभी बहुत चौड़ा था
और जिस पर मैं निश्चिंत सोया करता था
अब पसलियों के भीतर तक सिकुड़ गया है।
लेकिन आज भी उसके अंदर
दुनिया का सबसे बड़ा दिल रहता है।
पिताजी!
ओ मेरे पिता!!

   
        - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                29/09/2019
            नगरी, जिला - धमतरी

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