पिता!
ओ मेरे पिताजी!!
अब आपके कंधे झुके हुए हैं;
वे कंधे
जो कभी
काफी मजबूत होते थे।
जिन पर मुझे बिठा कर
गांव की गलियों में घंटों घुमाया करते थे।
खेतों की हरियाली
और
फसलों की बाली दिखाते।
कभी तालाब के शांत-स्वच्छ जल में
मछलियों की कलाबाजी दिखाते।
कभी नदी किनारे ले जाते
तो कभी बगीचों की सैर कराते।
मेरे देव!
मुझे अपने सिर पर फूल समझ कर चढ़ाए रहते
और मैं खुद को दूसरों से ऊंचा समझ कर
उनके बौनेपन पर हंसता था।
न आपके तन में थकान होती थी
और न चेहरे पर चिंता के निशान होते थे।
मेरी एकरसता भंग करने के लिए
मुझे अपने हाथों से
इस कंधे से उस कंधे पर ले जाते थे;
उन हाथों से
जो बहुत मजबूत और सक्षम होते थे।
उन्हीं हाथों से
मेरे पसंदीदा आम के पेड़ की फुनगी से भी
फल गिराते थे।
मेरी एक इच्छा पर
बाड़ी में अमरूद के पेड़ पर दौड़ कर चढ़ जाते थे।
अपने मजबूत दांतों से
गन्ने निस कर सभी भाई-बहनों को खिलाते थे।
भरी गरमी में नदी की रेत में
तुरंत झिरिया खोद कर पानी पिलाते थे।
सीना जो कभी बहुत चौड़ा था
और जिस पर मैं निश्चिंत सोया करता था
अब पसलियों के भीतर तक सिकुड़ गया है।
लेकिन आज भी उसके अंदर
दुनिया का सबसे बड़ा दिल रहता है।
पिताजी!
ओ मेरे पिता!!
- किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
29/09/2019
नगरी, जिला - धमतरी
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