सोमवार, 23 अप्रैल 2018

लेनिन और भारतीय महापुरुष

East or west
India is best.

      हमारी विनम्र प्रार्थना है कि भारत के महामानवों की तुलना लेनिन से कदापि नहीं करें। खूनी क्रांति के सूत्रधार लेनिन प्रतिहिंसा का अवतार था। रुसी क्रांति के दौरान विरोधी वर्गों की समाप्ति के नाम पर भयंकर खून खराबा को अंजाम दिया गया जिसमें चिन्हित वर्ग की गर्भवती महिलाओं की कोख फाड़ कर बदला लिया गया। सत्ता परिवर्तन के बाद भी राजनीतिक हत्याओं का दौर जारी रहा तथा लेनिन और उसके उत्तराधिकारियों के निर्देशन में सामूहिक नरसंहार होते रहे। लेनिन की नीतियों और कार्यों के दुष्परिणामों को पूर्व सोवियत संघ के महान नेता मिखाईल गोर्वाच्योव की पेरोस्त्रोइका (पुनर्गठन) और ग्लासनोस्त(पारदर्शिता) के प्रगतिशील कार्यक्रमों के द्वारा भी दूर नहीं किया जा सका। लेनिन के अपने ही देश में, 80 वर्षों के भीतर उसकी विचारधारा से लोगों का मोहभंग हो गया। इसकी तानाशाही नीतियों से त्रस्त लोगों ने इसकी मूर्तियों  को गिरवा दिया।
                                     इसलिए हमारे महापुरुषों की लेनिन से तुलना करके उनका अपमान नहीं करिए। चाहे महाकरुणा का उपदेश देने वाले बुद्ध हो, अहिंसा के आग्रही महात्मा गांधी हो या स्वयं पददलित और शोषित होने के बावजूद समता का संदेश देने वाले अंबेडकर हो, ये सभी क्षमा और त्याग की मूर्ति थे। यहां तक कि सेंट्रल असेंबली में भगतसिंह द्वारा फेंका गया बम किसी को मारने या डराने के लिए न होकर बहरों को सुनाने के लिए था।

बुधवार, 18 अप्रैल 2018

पंडवानी

पंडवानी

पंडवानी में पांडवों की अर्थात् महाभारत की कथा की लोक शैली में संगीतमय प्रस्तुति होती है। वैसे पंडवानी का साहित्यिक आधार  सबलसिंह चौहान के द्वारा रचित दोहा-चौपाई महाभारत है; परंतु इसकी गायकी परधान जनजाति द्वारा विकसित विशिष्ट शैली पर आधारित है। दुनिया के श्रेष्ठ महाकाव्य महाभारत को  लोकरंग में रंग कर उसकी संपूर्ण भव्यता को कायम रखते हुए एक ही कलाकार के द्वारा सरस रूप में जन-जन तक पहुंचा पाना बहुत बड़ी कलात्मक उपलब्धि होती है।
              प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से पंडवानी की ​दो मुख्य शैलियों का उल्लेख किया जाता है। कुछ कलाकार बैठे-बैठे 'तंबूरा' बजाते हुए पंडवानी गाते हैं । यह पंडवानी गायन की वेदमती शैली है। जबकि कापालिक शैली में कलाकार खड़े हो गाते हुए और तंबूरा बजा कर नाचते हुए पंडवानी प्रस्तुत करता है। चाहे वेदमती शैली हो या कापालिक दोनों में ही पंडवानी गायक कंठस्थ की हुई लोकगाथा को गाते हैं किसी पुस्तक को पढ़ते हुए प्रस्तुतीकरण नहीं देते। मंच पर महाभारत-ग्रंथ अवश्य रखा है जाता है लेकिन केवल पूजा और इस महान ग्रंथ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए।
                         पंडवानी गायन की सर्वश्रेष्ठ कलाकार श्रीमती तीजन बाई हैं जिन्होंने इस लोकगायन को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। श्रीमती तीजन बाई की पंडवानी गायन कला बहुत ही अच्छी है परंतु साथ में उनका व्यक्तित्व भी उनके प्रस्तुतीकरण को और भी सफल बना देता है। अपने लंबे-चौड़े  शारीरिक बनावट के कारण भी वह भीम और दुर्योधन जैसे पुरुषत्व की पराकाष्ठा वाले किरदारों को भी मंच पर जीवंत कर देती हैं तथा उनके चौड़े चेहरे पर भाव-भंगिमा की एक एक रेखाएं आसानी से दिखाई देती हैं।
            पंडवानी में रागी नामक कलाकार भी होता है। एक ओर तो रागी पंडवानी गायक मुख्य कलाकार के सुर में सुर मिला कर गाता है, दूसरी ओर वही व्यक्ति 'हां जी', 'हां भईया' आदि शब्दों के द्वारा श्रोताओं के प्रतिनिधि के रूप में पंडवानी गायक के कथा वाचन के बीच बीच में 'हुकारु' देता है। वास्तव में रागी पंडवानी गायक और श्रोताओं के बीच प्रस्तुतीकरण और रसानुभूति दोनों ही प्रक्रिाओं के लिए मध्यस्थ का कार्य करता है।

रविवार, 8 अप्रैल 2018

भारत छोड़ो आन्दोलन

सन् 1942 के 8/9 अगस्त की मध्य रात्रि में बम्बई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान से जब महात्मा गांधी ने 'अँगरेजों भारत छोड़ो' की आवाज बुलंद किया  तो ऐसा लगा जैसे उनके अंदर से पराधीन भारत की 30 करोड़ जनता बोल रही है। बी. पट्टाभि सीतारमैय्या की बात मानें तो जैसे उस समय कोई देवदूत बोल रहा था।जैसे ही उन्होंने 'करो या मरो' का नारा दिया; लोगों की रगों में बिजलियाँ दौड़ गयी। पूरा देश;सारी जड़ता और कमजोरी को फेंक कर इस कदर खड़ा हो गया कि सभी बड़े नेताओं के कैद हो जाने के बावजूद भारत की जनता ने अँगरेजों के छक्के छुड़ा दिए। नतीजन कुछ देर से ही सही मजबूरन अँगरेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा।
                  आज की पीढ़ी गाँधीजी के योगदान को सही तरीके से समझ नहीं पाती। क्योंकि उन्हें इतिहास की  ठीक-ठाक जानकारी नहीं दी गई।  भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में बात की जाए तो सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि गाँधीजी को छोड़कर किसी भी बड़े राजनीतिक दल का कोई भी नेता यह नहीं चाहता था कि उस समय अँगरेजों के खिलाफ कोई आंदोलन चले।
                स्वयं कांग्रेसियों ने गाँधीजी के भारत छोड़ो के प्रस्ताव का विरोध किया। तब गाँधीजी ने धमकी दिया कि वह 'देश की बालू से कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे'। गाँधीजी तो सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद ही कांग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र दे चुके थे। इस धमकी से तो कांग्रेसियों के पैरों तले जमीन ही खिसक गयी। मजबूरन वर्धा अधिवेशन में गाँधीजी के भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकृति देनी पड़ी।
                पंडित नेहरू भी नहीं चाहते थे कि अँगरेज जो नाजीवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं उनको मुसीबत में डाला जाए। और जब उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी सुभाषचंद्र बोस जर्मनी-जापान की सहायता से कुछ सफल होकर जनता के हीरो बन गए थे तो वह अँगरेजों के समर्थन में और सुभाषचंद्र के खिलाफ खुद तलवार उठाने तक की बात कर गए।
                           साम्वादियों की सहानुभूति सोवियत रूस के साथ थी जो अँगरेजों की तरफ लड़ रहा था।उन्होंने(कम्युनिस्टों ने) भारत छोड़ो आंदोलन का इतना ज्यादा विरोध किया था कि जनता कम्युनिस्ट का अर्थ  देशद्रोही समझने लगी थी।
                         मुस्लिम लीग, उदारवादी दल, हिन्दू महासभा तथा डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर ने भी अपने-अपने संकुचित दृष्टिकोणों और निहित स्वार्थों के आधार पर भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया।
                               तो क्या केवल महात्मा गाँधी जनता की आशाओं-आकांक्षाओं को समझ पाये बाकी नेता नहीं समझ पाये? नहीं; वे भी अच्छी तरह जानते समझते थे कि देश की जनता को हर हाल में आजादी चाहिए परंतु वे नेता ऐसी आजादी हरगिज नहीं चाहते थे जिसमें वे अपनी राजनीतिक रोटी न सेंक सकें।

बुद्ध

आज बुद्ध पूर्णिमा है।
               विश्व को करुणा का उपदेश देने वाले महात्मा बुद्ध का जन्म बैशाख पूर्णिमा को हुआ था।उनको ज्ञान की प्राप्ति भी बैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुआ तथा निर्वाण की प्राप्ति भी बैशाख पूर्णिमा को ही हुई थी।
                 महात्मा बुद्ध शाक्य कुल के राज परिवार में जन्मे थे।वे राजकुमार थे।शाक्य गणराज्य के उत्तराधिकारी थे।उनके चरणों में दुनिया की समस्त सुख सुविधाएँ थी।वे होने वाले राजा थे।परंतु मानवता के कल्याण के लिए वह संन्यासी बन गए।
                       यदि बुद्ध और महावीर पैदा नहीं होते तो शायद भारतीय सर्वाधिक हिंसक और खूंखार प्रजाति के लोग माने जाते क्योंकि कि बुद्ध से ठीक पहले वैदिक विचारों की तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी।पूरण काश्यप,अजित केशकंबलिन आदि विचारक जनता में यह प्रचारित करना शुरू कर चुके थे कि कोई भी कर्म अच्छा या बुरा नहीं होता।कर्मों का कोई फल नहीं मिलता।पाप पुण्य,स्वर्ग नर्क,अनश्वर आत्मा,पुनर्जन्म आदि सब बकवास हैं।जीवन एक बार संयोग से मिल गया है,दोबारा नहीं मिलेगा।
                   बुद्ध ने इन खतरनाक विचारों का विरोध किया।वैदिक व्यवस्था का भी उन्होंने विरोध किया।दुनिया को मध्यम मार्ग दिया।संतुलित तरीके से जीना सिखाया।
               ऐसे महात्यागी, महाग्यानी,महात्मा बुद्ध को कोटि-कोटि प्रणाम।

करतार सिंह सराभा

महान् क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा।
               करतार सिंह सराभा का जन्म 24 मई1896 को जालंधर में हुआ था।उच्च शिक्षा के लिए वे 1911 में अमेरिका पहुँचे।वहीं 1913 में लाला हरदयाल के प्रभाव में आकर क्रांतिकारी बन गए।सानफ्रांसिसको से गदर पत्रिका के पंजाबी संस्करण के संपादक करतार सिंह सराभा थे।अमेरिका में रहने वाले चार हजार भारतीयों का आर्थिक और नैतिक सहयोग सराभा को मिला। एक जहाज में गोला बारूद और बंदूके लेकर वे भारत की ओर प्रस्थान किए ।दुर्भाग्य से जहाज अँगरेजों ने पकड़ लिया परंतु सराभा बच निकले।
             रासबिहारी बोस के सहयोग से वह पंजाब में क्रांतिकारी आंदोलन संगठित किया।उनका उद्देश्य 21 मई1915 को पूरे देश के सैनिक छावनी में एक साथ विद्रोह भड़काना था।परंतु इसकी भी भनक अंग्रेजी सरकार को लग गयी।करतार सिंह को काबुल भाग जाने की सलाह देकर रासबिहारी बोस जापान चले गए।
      रास्ते में उन्हें लगा कि भागने से अच्छा है कि खुद को गिरफ्तार कराये।वजीराबाद की सैनिक छावनी में जाकर अँगरेजों के खिलाफ सैनिकों को विद्रोह के लिए भड़काने के प्रयास में वे पकड़े गए।
                      16नवंबर1915 को करतार सिंह सराभा को फांसी दे दी गयी।तब वे 19 साल के थे।जज का कहना था--इस युवक ने अमेरिका से लेकर हिंदुस्तान तक अंग्रेजी सरकार को उलटने का प्रयास किया।इसे जब और जहाँ अवसर मिला,अंग्रेजों को हानि पहुँचाने की कोशिश की।इसकी उम्र बहुत कम है परंतु अँगरेजी सरकार के लिए बहुत ही भयानक है।

3 जून

3जून भारत के इतिहास का काला दिन कहा जा सकता है।3जून 1947 को माउंटबेटन ने भारत के बँटवारे का मसौदा पेश किया।जिसे कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया।माउंटबेटन योजना के तहत भारत को पाकिस्तान और हिंदुस्तान दो अधिराज्यों में बाँट दिया गया।पंडित नेहरू तो बहुत पहले ही बँटवारे के लिए तैयार थे।कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जे बी कृपलानी भी विभाजन के पक्षधर थे। और जिन्ना तो किसी भी कीमत पर अलग पाकिस्तान चाहते थे।
            मौलाना आजाद ने विभाजन का विरोध किया।गाँधीजी ने कहा कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा।वे आखिर तक विभाजन टालने के पक्ष में थे।
                दरअसल जिन्ना प्रारंभ से ही राष्ट्रीय आंदोलन के मुखिया बनना चाहते थे।उनकी सोच थी कि वयोवृद्ध तिलक जी के बाद उनका ही नंबर आयेगा।परंतु तिलक की मृत्यु के बाद गाँधीजी भारतीय राजनीति के सर्वमान्य नेता हो गये।परंतु फिर भी जिन्ना ने धीरज नहीं खोया।क्योंकि गाँधीजी को सत्ता का कोई लोभ नहीं था। गाँधीजी इतने शक्तिशाली हो चुके थे कि उनके बिना राष्ट्रीय आंदोलन चलाने की बात कांग्रेसी सोच ही नहीं सकते थे।विरोध करने का तो सवाल ही नहीं था।विरोध में आये तो केवल सुभाषचंद्र बोस।गाँधीजी के विरोध के बावजूद वे दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।परंतु सुभाषचंद्र के तानाशाही व्यक्तित्व को पहचान कर गाँधीजी ने उन्हें कार्य नहीं करने दिया।मजबूरन बोस को कांग्रेस छोड़ना पड़ा।गाँधीजी की नजर में पंडित नेहरू ही सबसे ज्यादा योग्य व्यक्ति थे जो भारतीय जनता के सभी वर्गों को स्वीकार्य थे।अब जिन्ना का धैर्य समाप्त हो चुका था।वे समझ चुके थे कि नेहरू के होते उनका PM बनना नामुमकिन है।सन् 40 तक जिन्ना ने अलग पाकिस्तान का नारा बुलंद कर दिया।
           गाँधीजी समझ गए थे कि जिन्ना और नेहरू के प्रधानमंत्री बनने की जिद के कारण देश का बँटवारा हो रहा है।परंतु जब आजादी मिलने ही वाली थी तब गाँधीजी की अहमियत नेहरू और जिन्ना की नजरों में कम हो चुकी थी। दोनों में से कोई त्याग करना नहीं चाहते थे।गाँधीजी ने सलाह दिया की जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाकर भारत का विभाजन रोक दिया जाए।पर नेहरू कहाँ मानने वाले थे?सवाल दो राष्ट्रों के सिद्धांत का नहीं था।वास्तविक प्रश्न था दो अतिमहत्वाकांक्षी लोगों की सत्तालोलुपता का।गाँधीजी किनारे कर दिए गए।हिंदुस्तान और पाकिस्तान सांप्रदायिक दंगों में जल रहे थे तब दोनों देशों के नेतागण सत्ता की बंदरबांट कर रहे थे।वैसे में अकेले गाँधीजी बड़े साहस के साथ दंगा पीड़ित इलाकों में जाकर लोगों के आँसू पोछ रहे थे।

आपातकाल

1971 के लोकसभा चुनाव में"गरीबी हटाओ" का नारा देकर  भारी बहुमत से इंदिराजी जीत गईं। अमेरिका के विरोध के बावजूद इंदिराजी ने पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध का कुशल नेतृत्व करके दुनिया के नक्शे में एक नया देश बना दिया। वे अपने आपको भारत की "साम्राज्ञी" समझने लगी। उनके पास सिद्धार्थ शंकर रे और संजय गांधी के रूप में दो "अतियोग्य" सलाहकार भी थे।
                  परंतु 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से इंदिरा गांधी की नींद उड़ गयी। न्यायालय मे साबित हो गया कि वह गलत तरीकों से रायबरेली का चुनाव जीतीं हैं। परिणाम रद्द करते हुए उन पर छ: वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया।
                उक्त आधार पर इंदिराजी को सत्ता में रहने का अधिकार नहीं था। परंतु वह  सुप्रीम कोर्ट से कुछ राहत लेने में सफल हो गईं। 25 जून को जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली के रामलीला मैदान से विशाल जन सभा में इंदिरा सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया।
                     सत्ता के मोह में इंदिरा गाँधी ने 26  जून 1975 से आपातकाल की घोषणा कर दी। जिस जनता ने उसकी पार्टी को लोकसभा में 352 सीटें दी उन्हीं पर संविधान का अनुच्छेद 352 थोप दिया। परिणाम ---लोकसभा भंग , मूल अधिकारों का निलंबन,  विरोधी जेल में, जबरन नसबंदी।
                  जनता ने भी बदला ले लिया। 1977के आम चुनाव में  कांग्रेस चारों खाने चित  थी ।यूपी ,बिहार,पंजाब,हरियाणा, दिल्ली,मध्यप्रदेश में उसे एक भी सीट नहीं मिली। ऱायबरेली से खुद इंदिराजी चुनाव हार गईं।

आत्ममुग्धता से बचना जरूरी है

कारगिल विजय दिवस पर विशेष।

अतीत पर गर्व जरुर करें,
परंतु निरंतर आत्म-मुग्धता भयंकर विनाशकारी हो सकती है।

अँगरेजों के कुकृत्यों के फलस्वरूप हिन्दुस्तान के गर्भ में एक नाजायज बच्चा पलने लगा था।पैदा होने के पहले ही उस नापाक का नाम पाकिस्तान रख लिया गया।अँगरेजों ने उसे दुनिया में जल्दी लाने के लिए सीजर द्वारा समय पूर्व पैदा करा दिया।भारत का चीर-फाड़ करके पाकिस्तान को दुनिया में लाया गया। भारत देश दर्द से कराह उठा।उसकी चीख केवल महात्मा गांधी सुन पा रहे थे। बाकी नेता तो हिन्दुस्तान की आजादी से एक दिन पहले 14 अगस्त को ही पाकिस्तान की आजादी को स्वीकार कर लिए थे क्योंकि वे सत्ता में भागीदारी पाने के लिए उतावले थे।
                           पाकिस्तान की मनोदशा में वो तमाम कमियाँ है जो एक 'नाजायज औलाद' और 'प्रीमैच्योर बेबी' में होती हैं। पाकिस्तान भारत को कोसते और भारत के सिर में मूतते हुए पैदा हुआ था और आज भी यही कर रहा है।
                    पाकिस्तान में सियासत के लिए एक ही काबिलियत जरूरी है कि हिन्दुस्तान को कोसना,गाली देना,भारत का विरोध करना।वहाँ सत्ता में टिके रहने के लिए लगातार राग-कश्मीर अलापना बेहद जरूरी है।
                       यह राग पाकिस्तानी अवाम को कितना अच्छा लगता है यह तो मालूम नहीं परंतु वहां की फौज को बहुत हीअच्छा लगता है क्योंकि कि उसे मार खाने की आदत जो हो गयी है।सन् 1948,1965,1971 और 1999 चारो बार भारतीय सेना के सामने (ना)पाकी फौज या तो चित हो गयी या पीठ दिखा के भागी है।
                      मजे की बात है कि हमने उन्हें चार बार नहीं हजारों बार क्षमा किया।परंतु मान लीजिए पाकिस्तान लड़ाई में यदि धोखे से भी एक बार भी जीत गया तो क्या होगा?क्या वे हमें छोड़ देंगे जैसे हमने उन्हें बाइज्जत जाने दिया?नहीं ना।पाकिस्तानी हुक्मरान मुहम्मद गोरी,महमूद गजनवी और औरंगजेब की परंपरा के हिमायती हैं।आप बखूबी समझ सकते हैं कि वैसी स्थित में अंजाम कितना भयंकर होगा।
             चारों बार हमारी जीत हुई फिर भी हमारी जमीन के कुछ हिस्से पर उनका कब्जा है। इसलिए यदि मौका मिलता है तो ऐसा सबक सिखाना जरूरी हो जाता है कि पाकिस्तान अगले हजार साल तक कश्मीर का नाम भूल कर बलूचिस्तान को याद करता रहे।
                        जय हिन्द।
                        जय भारत।।

जिंदगी के भीषण मरुस्थल में

जिंदगी के इस भीषण मरुस्थल में
जब चलती हैं कड़वे अनुभवों की
धूल-भरी भयंकर आंधियां;
तब बस एक तेरा वजूद
ओएसिस की हरियाली देता है मुझे।

इसलिए
जब मैं हो  जाऊं कभी किंकर्तव्यविमूढ़
सूझ न रहा हो कोई राह
जब आस न हो कोई दूजा
तब मेरे दीपक!
मुझे
उजाला देना
बाती की नोक भर।

ओएसिस=रेगिस्तान में बगीचा।

                               - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

एक और गांधी चाहिए

मुकम्मल आजादी के लिए एक और महात्मा की जरुरत है।
        
              28 दिसम्बर 1885 को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ । बम्बई​ के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज मे 72 सम्भ्रान्त लोगों ने INC के पहले अधिवेशन मे भाग लिया। इस कार्य मे ए ओ ह्यूम जो कि रिटायर्ड ब्रिटिश अफसर थे, का सक्रिय सहयोग मिला। कांग्रेस के संस्थापकों का उद्देश्य भारतीयों में एकता बढ़ाना और राजनीतिक सुधारों की मांग करना था। उनके देशप्रेम की भावना पर सन्देह नहीं किया जा सकता । परन्तु वे सम्भ्रान्त लोग थे। उनका जनता से सीधा लगाव नहीं  था​ । वे घोषित तौर पर राजनीतिक सुधारों की मांग जनता के लिए नहीं बल्कि अपने जैसे 'योग्य' लोगों के लिए कर रहे थे । उनको न जनता से लगाव था​ और न ही उनमें विश्वास था। 1917 में महात्मा गांधी   देश की राजनीति में आये तथा धमकेतु की तरह चमक गये। उन्होंने लाखों-लाख जनता को राष्ट्रीय जागरण तथा कांग्रेस से जोड़ा। गांधी जी को बेलगाम कांग्रेस का सभापति बनाया गया परन्तु वे  कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य भी नहीं थे। एक बार तो गांधी जी ने कांग्रेस को धमकी दिया कि वह और देश की जनता कांग्रेस की मोहताज नहीं हैं और कि वे देश की बालू से कांग्रेस से भी बड़ा जन आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। आजादी मिलने के बाद गांधीजी​ ने सलाह दी कि कांग्रेस का गठन जिस उद्देश्य के लिए किया गया वह पूरा हो गया इसलिए कांग्रेस को तोड़ देना चाहिए, ताकि जनता के त्याग का कांग्रेस अनुचित लाभ न उठा सके; परन्तु सत्ता के लालचियों ने देश को ही तोड़ दिया। गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों ने ले लिये। आजादी अधूरी रही। मुकम्मल आजादी के लिए एक  और महात्मा की जरुरत है। एक और 'मोहन' का इन्तजार है ।

बात अभी बाकी है..

बात अभी बाकी है।

पुराने जमाने में शोषण प्रत्यक्ष और भद्दा होता था। आसानी से समझ में आता भी था। लेकिन सदियों के शोषण के बावजूद भारतीय​ समाज कभी भयंकर सामाजिक क्रान्ति के दौर से गुजरा हो ऐसा उदाहरण शायद ही मिले। बहुत ही ज्यादा बर्दाश्त करने की भारतीयों की क्षमता का विकास कर्मफल और पुनर्जन्म की अवधारणा का एक प्रतिफल प्रतीत होता है। परंतु समय के साथ-साथ जन- साधारण​ का सामान्य बोध भी विकसित होता जाता है। इसलिए शोषण के पुराने तौर-तरीकों से काम नहीं किया जा सकता। चूंकि शोषक वर्ग दाल आटे के भाव वाली परेशानी से कोसों दूर होता है इसलिए उनका दिमाग भी समय से आगे ही चलता है। आज की स्थिति में दास बना कर रखना, बेगार, जबरन वसूली आदि को 'सभ्य' समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता। अतः शोषण के परिष्कृत​ तरीके अपनाए जाते हैं, इतनी अच्छी तरह से परिष्कृत कि आमजन समझ ही नहीं पाता या समझने का समय ही नहीं दिया जाता कि वह हमेशा-हमेशा के लिए मानसिक गुलाम बन चुका है। लोगों के भेजे में सिर्फ वही भरा जाता है जो वे चाहते हैं। स्कूल, कालेज, पत्र-पत्रिकाएं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट, सभी पर उनका कब्जा है। इनके जरिए लोगों को केवल निर्धारित बातें ही सिखाई जाती हैं। जो मध्यम वर्ग सामाजिक परिवर्तन का अगुआ हो सकता है उसे 1857 से अभी तक निम्न वर्ग से जुड़ने ही नहीं दिया जा रहा है।
      वे अपने कचरे को भी बेच लेते हैं अपने ही निर्धारित दरों पर। लेकिन दिहाड़ी मजदूर को केवल इतना ही देंगे कि वह जिंदा रहे मरे नहीं और उनके लिए संपत्ति का सृजन करता रहे। और किसान तो मजदूरों से गए गुजरे रहे हैं हमेशा-हमेशा।

बात अभी बाकी है.....

रविवार, 1 अप्रैल 2018

कृपया कचरा यहां डालें

कृपया कचरा यहां डालें।

सार्वजनिक स्थानों पर रखे गए कूड़ादानों के ऊपर कुछ इसी तरह लिखा होता है। हमारा पुलिस विभाग एक प्रकार से समाज का कूड़ादान है,जो पूरे समाज की गंदगी समेटकर रखता है। जो भी चोर, उचक्के, बदमाश जिन्हें आप अपने आस-पास भी देखना पसंद नहीं करते वे सब हमारे मत्थे हैं। जेल विभाग के लोग घिनौने अपराधियों के साथ  अपनी आधी जिंदगी गुजारते हैं। जिला पुलिस के अधिकारी-कर्मचारी 18-20 घंटे समाज का कचरा हटाते हैं। सशस्त्र बल के जवान 24सों घंटे नक्सलियों की मांद में रहते हैं,घर से दूर। हमारा मुख्य उद्देश्य तो परित्राणाय साधूनाम् है लेकिन इसके लिए आजकल दुष्टों का दमन आवश्यक हो गया है। बल्कि अब जब अमन के दुश्मनों की संख्या बहुत बढ़ चुकी है तो फिर उन्हीं से निपटने में ही हम व्यस्त रहते हैं अब आप इसी को सज्जनों का परित्राण मान लीजिए। चूंकि हमें अक्सर घटिया लोगों से निपटना होता है तो उन्हीं के काम करने के तरीकों से ही उन से निपट सकते हैं। हमें समाज को बीमार करने वाले कीटाणुओं और वायरसों से लड़ना है।हम पुलिस के लोग वैक्सिन की तरह हैं। आम लोगों की भाषा में कहूं तो जैसे ज़हर को काटने के लिए जहर का इस्तेमाल किया जाता है; सांप के काटे का वैक्सीन सांप के जहर से ही बनता है। ठीक वैसे ही हमारा पुलिस विभाग है। सही वैक्सीन सही मात्रा में लगने पर लाभ हो सकता है, लेकिन कम मात्रा में लगने से फायदा नहीं होता और ओवरडोज हो गया तो भयंकर नुकसान होगा। तो जनाब इस कम या ओवरडोज में उन बेचारे कमजोर कीटाणुओं का क्या दोष जो वैक्सीन में रहते हैं उन्हें तो अपने निर्धारित​ पैटर्न में ही काम करना है। मैं नि:संकोच स्वीकार करता हूं कि हम में भी बहुत सी कमियां हैं क्योंकि हम किसी दूसरी दुनिया से आए देवदूत नहीं हैं; और न ही पुलिस वाले पेड़ों पर फलते हैं। हम इसी समाज की उपज है , तमाम कमियों और परेशानियों से घिरे आम आदमी हैं हम। हमे किसी बाहरी नजर से नहीं देखें । पुलिस और सशस्त्र बलों को डाकुओं, नक्सलियों और आतंकवादियों जैसे लोकतंत्र विरोधी शक्तियों से लड़ने के लिए बनाया गया है। पुरानी कहावत है कि दुष्ट से दुष्टता से ही लड़ा जा सकता है; शठे शाठ्यम् समाचरेत्। गैर लोकतांत्रिक शक्तियों से लड़ने वाले किसी भी बल या फोर्स के अंदर जरा सा भी लोकतंत्र नहीं होता। पुलिस​और सशस्त्र बलों का प्रत्येक सदस्य चाहे अधिकारी हो या कर्मचारी दोनों ही गुलाम होते हैं, आदेशों के गुलाम। लेकिन यह गुलामी किसी मजबूरी का परिणाम न होकर योग्यता के बल पर अर्जित किया गया है । आप आजाद हैं हम पर कीचड़ उछालने के लिए, आप स्वतंत्र हैं हम पर थूकने के लिए । आपकी किस्मत में आजादी का सुख है जबकि हमें सेवा का सौभाग्य प्राप्त है।
                          जय हिंद।

                   किशोरी लाल वर्मा
                     कंपनी कमांडर
                छत्तीसगढ़ सशस्त्र बल