बात अभी बाकी है।
पुराने जमाने में शोषण प्रत्यक्ष और भद्दा होता था। आसानी से समझ में आता भी था। लेकिन सदियों के शोषण के बावजूद भारतीय समाज कभी भयंकर सामाजिक क्रान्ति के दौर से गुजरा हो ऐसा उदाहरण शायद ही मिले। बहुत ही ज्यादा बर्दाश्त करने की भारतीयों की क्षमता का विकास कर्मफल और पुनर्जन्म की अवधारणा का एक प्रतिफल प्रतीत होता है। परंतु समय के साथ-साथ जन- साधारण का सामान्य बोध भी विकसित होता जाता है। इसलिए शोषण के पुराने तौर-तरीकों से काम नहीं किया जा सकता। चूंकि शोषक वर्ग दाल आटे के भाव वाली परेशानी से कोसों दूर होता है इसलिए उनका दिमाग भी समय से आगे ही चलता है। आज की स्थिति में दास बना कर रखना, बेगार, जबरन वसूली आदि को 'सभ्य' समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता। अतः शोषण के परिष्कृत तरीके अपनाए जाते हैं, इतनी अच्छी तरह से परिष्कृत कि आमजन समझ ही नहीं पाता या समझने का समय ही नहीं दिया जाता कि वह हमेशा-हमेशा के लिए मानसिक गुलाम बन चुका है। लोगों के भेजे में सिर्फ वही भरा जाता है जो वे चाहते हैं। स्कूल, कालेज, पत्र-पत्रिकाएं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, इंटरनेट, सभी पर उनका कब्जा है। इनके जरिए लोगों को केवल निर्धारित बातें ही सिखाई जाती हैं। जो मध्यम वर्ग सामाजिक परिवर्तन का अगुआ हो सकता है उसे 1857 से अभी तक निम्न वर्ग से जुड़ने ही नहीं दिया जा रहा है।
वे अपने कचरे को भी बेच लेते हैं अपने ही निर्धारित दरों पर। लेकिन दिहाड़ी मजदूर को केवल इतना ही देंगे कि वह जिंदा रहे मरे नहीं और उनके लिए संपत्ति का सृजन करता रहे। और किसान तो मजदूरों से गए गुजरे रहे हैं हमेशा-हमेशा।
बात अभी बाकी है.....
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