3जून भारत के इतिहास का काला दिन कहा जा सकता है।3जून 1947 को माउंटबेटन ने भारत के बँटवारे का मसौदा पेश किया।जिसे कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया।माउंटबेटन योजना के तहत भारत को पाकिस्तान और हिंदुस्तान दो अधिराज्यों में बाँट दिया गया।पंडित नेहरू तो बहुत पहले ही बँटवारे के लिए तैयार थे।कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जे बी कृपलानी भी विभाजन के पक्षधर थे। और जिन्ना तो किसी भी कीमत पर अलग पाकिस्तान चाहते थे।
मौलाना आजाद ने विभाजन का विरोध किया।गाँधीजी ने कहा कि भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा।वे आखिर तक विभाजन टालने के पक्ष में थे।
दरअसल जिन्ना प्रारंभ से ही राष्ट्रीय आंदोलन के मुखिया बनना चाहते थे।उनकी सोच थी कि वयोवृद्ध तिलक जी के बाद उनका ही नंबर आयेगा।परंतु तिलक की मृत्यु के बाद गाँधीजी भारतीय राजनीति के सर्वमान्य नेता हो गये।परंतु फिर भी जिन्ना ने धीरज नहीं खोया।क्योंकि गाँधीजी को सत्ता का कोई लोभ नहीं था। गाँधीजी इतने शक्तिशाली हो चुके थे कि उनके बिना राष्ट्रीय आंदोलन चलाने की बात कांग्रेसी सोच ही नहीं सकते थे।विरोध करने का तो सवाल ही नहीं था।विरोध में आये तो केवल सुभाषचंद्र बोस।गाँधीजी के विरोध के बावजूद वे दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए।परंतु सुभाषचंद्र के तानाशाही व्यक्तित्व को पहचान कर गाँधीजी ने उन्हें कार्य नहीं करने दिया।मजबूरन बोस को कांग्रेस छोड़ना पड़ा।गाँधीजी की नजर में पंडित नेहरू ही सबसे ज्यादा योग्य व्यक्ति थे जो भारतीय जनता के सभी वर्गों को स्वीकार्य थे।अब जिन्ना का धैर्य समाप्त हो चुका था।वे समझ चुके थे कि नेहरू के होते उनका PM बनना नामुमकिन है।सन् 40 तक जिन्ना ने अलग पाकिस्तान का नारा बुलंद कर दिया।
गाँधीजी समझ गए थे कि जिन्ना और नेहरू के प्रधानमंत्री बनने की जिद के कारण देश का बँटवारा हो रहा है।परंतु जब आजादी मिलने ही वाली थी तब गाँधीजी की अहमियत नेहरू और जिन्ना की नजरों में कम हो चुकी थी। दोनों में से कोई त्याग करना नहीं चाहते थे।गाँधीजी ने सलाह दिया की जिन्ना को प्रधानमंत्री बनाकर भारत का विभाजन रोक दिया जाए।पर नेहरू कहाँ मानने वाले थे?सवाल दो राष्ट्रों के सिद्धांत का नहीं था।वास्तविक प्रश्न था दो अतिमहत्वाकांक्षी लोगों की सत्तालोलुपता का।गाँधीजी किनारे कर दिए गए।हिंदुस्तान और पाकिस्तान सांप्रदायिक दंगों में जल रहे थे तब दोनों देशों के नेतागण सत्ता की बंदरबांट कर रहे थे।वैसे में अकेले गाँधीजी बड़े साहस के साथ दंगा पीड़ित इलाकों में जाकर लोगों के आँसू पोछ रहे थे।
रविवार, 8 अप्रैल 2018
3 जून
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