बुधवार, 18 अप्रैल 2018

पंडवानी

पंडवानी

पंडवानी में पांडवों की अर्थात् महाभारत की कथा की लोक शैली में संगीतमय प्रस्तुति होती है। वैसे पंडवानी का साहित्यिक आधार  सबलसिंह चौहान के द्वारा रचित दोहा-चौपाई महाभारत है; परंतु इसकी गायकी परधान जनजाति द्वारा विकसित विशिष्ट शैली पर आधारित है। दुनिया के श्रेष्ठ महाकाव्य महाभारत को  लोकरंग में रंग कर उसकी संपूर्ण भव्यता को कायम रखते हुए एक ही कलाकार के द्वारा सरस रूप में जन-जन तक पहुंचा पाना बहुत बड़ी कलात्मक उपलब्धि होती है।
              प्रस्तुतीकरण की दृष्टि से पंडवानी की ​दो मुख्य शैलियों का उल्लेख किया जाता है। कुछ कलाकार बैठे-बैठे 'तंबूरा' बजाते हुए पंडवानी गाते हैं । यह पंडवानी गायन की वेदमती शैली है। जबकि कापालिक शैली में कलाकार खड़े हो गाते हुए और तंबूरा बजा कर नाचते हुए पंडवानी प्रस्तुत करता है। चाहे वेदमती शैली हो या कापालिक दोनों में ही पंडवानी गायक कंठस्थ की हुई लोकगाथा को गाते हैं किसी पुस्तक को पढ़ते हुए प्रस्तुतीकरण नहीं देते। मंच पर महाभारत-ग्रंथ अवश्य रखा है जाता है लेकिन केवल पूजा और इस महान ग्रंथ के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए।
                         पंडवानी गायन की सर्वश्रेष्ठ कलाकार श्रीमती तीजन बाई हैं जिन्होंने इस लोकगायन को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई। श्रीमती तीजन बाई की पंडवानी गायन कला बहुत ही अच्छी है परंतु साथ में उनका व्यक्तित्व भी उनके प्रस्तुतीकरण को और भी सफल बना देता है। अपने लंबे-चौड़े  शारीरिक बनावट के कारण भी वह भीम और दुर्योधन जैसे पुरुषत्व की पराकाष्ठा वाले किरदारों को भी मंच पर जीवंत कर देती हैं तथा उनके चौड़े चेहरे पर भाव-भंगिमा की एक एक रेखाएं आसानी से दिखाई देती हैं।
            पंडवानी में रागी नामक कलाकार भी होता है। एक ओर तो रागी पंडवानी गायक मुख्य कलाकार के सुर में सुर मिला कर गाता है, दूसरी ओर वही व्यक्ति 'हां जी', 'हां भईया' आदि शब्दों के द्वारा श्रोताओं के प्रतिनिधि के रूप में पंडवानी गायक के कथा वाचन के बीच बीच में 'हुकारु' देता है। वास्तव में रागी पंडवानी गायक और श्रोताओं के बीच प्रस्तुतीकरण और रसानुभूति दोनों ही प्रक्रिाओं के लिए मध्यस्थ का कार्य करता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें