रविवार, 8 अप्रैल 2018

एक और गांधी चाहिए

मुकम्मल आजादी के लिए एक और महात्मा की जरुरत है।
        
              28 दिसम्बर 1885 को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन हुआ । बम्बई​ के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कालेज मे 72 सम्भ्रान्त लोगों ने INC के पहले अधिवेशन मे भाग लिया। इस कार्य मे ए ओ ह्यूम जो कि रिटायर्ड ब्रिटिश अफसर थे, का सक्रिय सहयोग मिला। कांग्रेस के संस्थापकों का उद्देश्य भारतीयों में एकता बढ़ाना और राजनीतिक सुधारों की मांग करना था। उनके देशप्रेम की भावना पर सन्देह नहीं किया जा सकता । परन्तु वे सम्भ्रान्त लोग थे। उनका जनता से सीधा लगाव नहीं  था​ । वे घोषित तौर पर राजनीतिक सुधारों की मांग जनता के लिए नहीं बल्कि अपने जैसे 'योग्य' लोगों के लिए कर रहे थे । उनको न जनता से लगाव था​ और न ही उनमें विश्वास था। 1917 में महात्मा गांधी   देश की राजनीति में आये तथा धमकेतु की तरह चमक गये। उन्होंने लाखों-लाख जनता को राष्ट्रीय जागरण तथा कांग्रेस से जोड़ा। गांधी जी को बेलगाम कांग्रेस का सभापति बनाया गया परन्तु वे  कांग्रेस के प्राथमिक सदस्य भी नहीं थे। एक बार तो गांधी जी ने कांग्रेस को धमकी दिया कि वह और देश की जनता कांग्रेस की मोहताज नहीं हैं और कि वे देश की बालू से कांग्रेस से भी बड़ा जन आंदोलन खड़ा कर सकते हैं। आजादी मिलने के बाद गांधीजी​ ने सलाह दी कि कांग्रेस का गठन जिस उद्देश्य के लिए किया गया वह पूरा हो गया इसलिए कांग्रेस को तोड़ देना चाहिए, ताकि जनता के त्याग का कांग्रेस अनुचित लाभ न उठा सके; परन्तु सत्ता के लालचियों ने देश को ही तोड़ दिया। गोरे अंग्रेजों की जगह काले अंग्रेजों ने ले लिये। आजादी अधूरी रही। मुकम्मल आजादी के लिए एक  और महात्मा की जरुरत है। एक और 'मोहन' का इन्तजार है ।

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