मेरे द्वारा रचित छत्तीसगढ़ी कविता
"सुन तो भईया मंगलू..."
आपकी सेवा में सादर प्रस्तुत है।
सुन तो भईया मंगलू!
ऊटपटांग नई गोठियान बने-बने बोलबो।
ठेलहा नई बइठन चांदनी चौक में चीला रोटी के दुकान खोलबो।
दरुआहा!दरुआहा!! बहुत सुनेन।
अब ठर्रा ल छोड़ के,बियर के ढक्कन खोलबो।।
भईया मंगलू!ऊटपटांग नई गोठियान बने-बने बोलबो।।
आपस में नई लड़न
मंद बर।
कांच के गिलास में ढार के
अऊ बरोबर कटार के चियर्स बोलबो।।
भईया मंगलू!ऊटपटांग नई गोठियान बने-बने बोलबो।।
बहुत मार खाएन छेड़छाड़ अऊ जबरदस्ती में।
अब किलर के जींस अऊ ली के टी शर्ट पहिन के टूरी मन के आगू पाछू डोलबो।।
भईया मंगलू! ऊटपटांग नई गोठियान बने-बने बोलबो।
अऊ ठेलहा नई बइठन चांदनी चौक में चीला रोटी के दूकान ज़रूर खोलबो।।
--किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'।
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