रविवार, 8 अप्रैल 2018

जिंदगी के भीषण मरुस्थल में

जिंदगी के इस भीषण मरुस्थल में
जब चलती हैं कड़वे अनुभवों की
धूल-भरी भयंकर आंधियां;
तब बस एक तेरा वजूद
ओएसिस की हरियाली देता है मुझे।

इसलिए
जब मैं हो  जाऊं कभी किंकर्तव्यविमूढ़
सूझ न रहा हो कोई राह
जब आस न हो कोई दूजा
तब मेरे दीपक!
मुझे
उजाला देना
बाती की नोक भर।

ओएसिस=रेगिस्तान में बगीचा।

                               - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें