जिंदगी के इस भीषण मरुस्थल में
जब चलती हैं कड़वे अनुभवों की
धूल-भरी भयंकर आंधियां;
तब बस एक तेरा वजूद
ओएसिस की हरियाली देता है मुझे।
इसलिए
जब मैं हो जाऊं कभी किंकर्तव्यविमूढ़
सूझ न रहा हो कोई राह
जब आस न हो कोई दूजा
तब मेरे दीपक!
मुझे
उजाला देना
बाती की नोक भर।
ओएसिस=रेगिस्तान में बगीचा।
- किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
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