अब रोवाथे तोर सुरता
कभू तैं हंसास।
तोर सुध म ओ बही!
मोर मन रथे उदास।।
मंगलवार, 29 सितंबर 2015
सोमवार, 28 सितंबर 2015
आम आदमी/कॉमन मैन
महँगाई का मारा
मुसीबतों से बेचैन।
भाई !
मैं आम आदमी
कॉमन मैन।
चुनाव के वक्त
हर नेता का सगा होता हूँ।
और चुनाव के बाद
मैं ठगा होता हूँ।
सत्ता पर काबिज हैं
वो पकड़ के
मेरी गरीबी का दामन।
भाई!
मैं आदमी हूँ आम
मैन हूँ कॉमन।
ले दे के ला पाता हूँ
बूढ़े बाप की दवाई।
मुश्किल से चलती है
बच्चों की पढ़ाई लिखाई।
बिजली का बिल,
ट्यूशन की फीस।
साल भर से बीवी को दिया नहीं
साड़ी एक पीस।
हर जगह मेरी यही हालात
रायपुर रहूँ या उज्जैन।
भाई !
मैं आम आदमी
कॉमन मैन।
जुलूस और हड़ताल में
पुलिस की लाठी खाने
सबसे आगे खड़ा होता हूँ
और कभी ट्रक के नीचे दबकर मरे
हुए कुत्ते की तरह
सड़क पर पड़ा होता हूँ।
न मेरी मौत का मोल है
न जिन्दगी का दाम।
भाई!
मैं आदमी हूँ आम।
आदमी हूँ आम।।
मुसीबतों से बेचैन।
भाई !
मैं आम आदमी
कॉमन मैन।
चुनाव के वक्त
हर नेता का सगा होता हूँ।
और चुनाव के बाद
मैं ठगा होता हूँ।
सत्ता पर काबिज हैं
वो पकड़ के
मेरी गरीबी का दामन।
भाई!
मैं आदमी हूँ आम
मैन हूँ कॉमन।
ले दे के ला पाता हूँ
बूढ़े बाप की दवाई।
मुश्किल से चलती है
बच्चों की पढ़ाई लिखाई।
बिजली का बिल,
ट्यूशन की फीस।
साल भर से बीवी को दिया नहीं
साड़ी एक पीस।
हर जगह मेरी यही हालात
रायपुर रहूँ या उज्जैन।
भाई !
मैं आम आदमी
कॉमन मैन।
जुलूस और हड़ताल में
पुलिस की लाठी खाने
सबसे आगे खड़ा होता हूँ
और कभी ट्रक के नीचे दबकर मरे
हुए कुत्ते की तरह
सड़क पर पड़ा होता हूँ।
न मेरी मौत का मोल है
न जिन्दगी का दाम।
भाई!
मैं आदमी हूँ आम।
आदमी हूँ आम।।
किशोरी लाल वर्मा
रविवार, 27 सितंबर 2015
आदमी जानवर होता जा रहा है।
हम रोज देखते हैं
सभ्य होने का दावा करने वाले
सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के ढोल पीटने वाले
निरा पशु को
आदमी का मुखौटा लगाये
आदमी के वेश में
आदमियों के बीच।
मानवरूपधारी यह दानव
अपनी छल की ढॉड़ों से
मनुष्य की अस्थि को
बटेर की टांग की तरह चबा डालता है।
उसकी लोभ वृत्ति
कुत्ते की जीभ की तरह लंबी और
आग की लपटों सी लपलपाती है।
हे! महाविज्ञानी!चार्ल्स डार्विन!!
इंसान
जिसे आपने
बन्दर की औलाद कहा था
बन्दर से भी
नीच नासमझ होता जा रहा है
विकासवाद के विरुद्ध
आदमी जानवर होता जा रहा है
आदमी जानवर होता जा रहा है।
किशोरी लाल वर्मा
सभ्य होने का दावा करने वाले
सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के ढोल पीटने वाले
निरा पशु को
आदमी का मुखौटा लगाये
आदमी के वेश में
आदमियों के बीच।
मानवरूपधारी यह दानव
अपनी छल की ढॉड़ों से
मनुष्य की अस्थि को
बटेर की टांग की तरह चबा डालता है।
उसकी लोभ वृत्ति
कुत्ते की जीभ की तरह लंबी और
आग की लपटों सी लपलपाती है।
हे! महाविज्ञानी!चार्ल्स डार्विन!!
इंसान
जिसे आपने
बन्दर की औलाद कहा था
बन्दर से भी
नीच नासमझ होता जा रहा है
विकासवाद के विरुद्ध
आदमी जानवर होता जा रहा है
आदमी जानवर होता जा रहा है।
किशोरी लाल वर्मा
शनिवार, 26 सितंबर 2015
मेरे गाँव की पगडंडी
आसमान में
बिजली चमककर
जैसे स्थिर हो गयी हो;
हरियाली की पृष्ठभूमि में
वैसी ही उजली- उजली
यह पगडंडी
मेरे गाँव की ओर जाती है।
चलो यह ठीक है कि
इसमें माइलस्टोन नहीं है ;
पर इसकी हरेक मोड़ पर
अपने खेत की मेड़ पर बैठकर
बढ़ती हुई फसल को
वात्सल्यपूर्ण दृष्टि से निहारते हुए
वृद्ध किसानों का अभिवादन प्राप्त कर
अवश्य प्रसन्न होओगे।
चलो यह भी ठीक है कि
इसमें जगह -जगह प्याऊ नहीं है।
पर झुरमुटों को पार कर
जैसे ही क्षीणधारा स्रोतस्विनी के जल को पीने झुकोगे
तो वहां स्नान करती ग्रामबालाओं के
स्वाभाविक मुख सौंदर्य को देखकर
अवश्य तृप्त होओगे।
और जैसे ही
मेरे गाँव की गली में प्रविष्ठ होओगे
वहाँ धूल में
नंगे पाँव नंगे
बदन खेलते हुए
इस देश के भविष्य को देख सकते हो।
इसलिए मित्र मेरे गाँव आना
और इसी पगडंडी से आना।
किशोरी लाल वर्मा
कांक्रीट के जंगल से उगता सूरज
सभी करते हैं सलाम
उगते सूरज को।
किशोरी लाल वर्मा
मैं भी करना चाहता हूँ --
सन सैल्यूट ,
सूर्य नमस्कार ,
उगते सूरज को।
पर मेरे सामने
कभी नहीं होता उगता सूरज।
मुझे दिखाई देता है सूरज
उग आने के काफी बाद ।
कांक्रीट के जंगलों से ऊपर आया
गुस्से में तमतमाया सूरज
घूरता है मुझे
सातवें आसमान से।
क्योंकि
उसका उदयाचल और अस्तांचल छीनने में
मेरा भी हाथ है
कुछ न कुछ।
किशोरी लाल वर्मा
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