आसमान में
बिजली चमककर
जैसे स्थिर हो गयी हो;
हरियाली की पृष्ठभूमि में
वैसी ही उजली- उजली
यह पगडंडी
मेरे गाँव की ओर जाती है।
चलो यह ठीक है कि
इसमें माइलस्टोन नहीं है ;
पर इसकी हरेक मोड़ पर
अपने खेत की मेड़ पर बैठकर
बढ़ती हुई फसल को
वात्सल्यपूर्ण दृष्टि से निहारते हुए
वृद्ध किसानों का अभिवादन प्राप्त कर
अवश्य प्रसन्न होओगे।
चलो यह भी ठीक है कि
इसमें जगह -जगह प्याऊ नहीं है।
पर झुरमुटों को पार कर
जैसे ही क्षीणधारा स्रोतस्विनी के जल को पीने झुकोगे
तो वहां स्नान करती ग्रामबालाओं के
स्वाभाविक मुख सौंदर्य को देखकर
अवश्य तृप्त होओगे।
और जैसे ही
मेरे गाँव की गली में प्रविष्ठ होओगे
वहाँ धूल में
नंगे पाँव नंगे
बदन खेलते हुए
इस देश के भविष्य को देख सकते हो।
इसलिए मित्र मेरे गाँव आना
और इसी पगडंडी से आना।
किशोरी लाल वर्मा
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