सभी करते हैं सलाम
उगते सूरज को।
किशोरी लाल वर्मा
मैं भी करना चाहता हूँ --
सन सैल्यूट ,
सूर्य नमस्कार ,
उगते सूरज को।
पर मेरे सामने
कभी नहीं होता उगता सूरज।
मुझे दिखाई देता है सूरज
उग आने के काफी बाद ।
कांक्रीट के जंगलों से ऊपर आया
गुस्से में तमतमाया सूरज
घूरता है मुझे
सातवें आसमान से।
क्योंकि
उसका उदयाचल और अस्तांचल छीनने में
मेरा भी हाथ है
कुछ न कुछ।
किशोरी लाल वर्मा

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