शनिवार, 26 सितंबर 2015

कांक्रीट के जंगल से उगता सूरज


सभी करते हैं सलाम
उगते सूरज को।
मैं भी करना चाहता हूँ --
सन सैल्यूट ,
सूर्य नमस्कार , 
उगते सूरज को।
पर मेरे सामने 
कभी नहीं होता उगता सूरज।
मुझे दिखाई देता है सूरज
उग आने के काफी बाद ।
कांक्रीट के जंगलों से ऊपर आया
गुस्से में तमतमाया सूरज
घूरता है मुझे 
सातवें आसमान से।
क्योंकि 
उसका उदयाचल और अस्तांचल छीनने में 
मेरा भी हाथ है 
कुछ न कुछ।


                                                                  
                                                          किशोरी लाल वर्मा

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