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रविवार, 4 अगस्त 2019

गरीब के दरद

नून नइहे, तेल नइहे, पिसान नइहे।
संगी नइहे, साथी नइहे, मितान नइहे।।

दुखे दुख में  कटत हे जिनगी,
करम में सुख के बिहान नइहे।
संगी नइहे, साथी नइहे, मितान नइहे।।

काम नइहे, धाम नइहे, नाम नइहे।
कहीं कोनो जगह पहचान नइहे।
संगी नइहे, साथी नइहे, मितान नइहे।।

कोनो गरजत हे, कोनो बरजत हे;
जइसे  मोर  कोई  ईमान  नइहे।
संगी नइहे, साथी नइहे, मितान नइहे।।

कभू कोनो भाय नहीं, बने कहाय नहीं।
मोला सहरइया कोनो सियान नइहे।
संगी नइहे,साथी नइहे, मितान नइहे।।

नून नइहे, तेल नइहे, पिसान नइहे।
संगी नइहे, साथी नइहे, मितान नइहे।।

                    - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                            03/08/2019
                        मुरागांव (कोरर), कांकेर

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

बिन पानी छूटत हे परान

बड़ जतन से बोएन  धान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

बरसा के चार महीना घूमन मोरा में।
अब सावन बीतगे बादर के अगोरा में।।
तरिया नंदिया सब सुख्खा परगे
कभू सब ल पूरा-पानी नहकान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

धनहा डोली में अब नइ तंउरे अइरी।
मेचका के नइ हे टेट-टेरी बोर-बोरी।।
गाय-गरु घलो हे हलाकान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

खेत में बनिहारीन के गीत नइ हे।
मौसम अब हमर मीत नइ हे।।
पहिली बरसत पानी में नहान।।
अब बिन पानी छूटत हे परान।।
बड़ जतन से बोएन धान।
बिन पानी छूटत हे परान।।

       
         किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
              26/07/2019
          मुरागांव (कोरर) कांकेर।

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

बुधवार, 12 जून 2019

पड़ चुका हूं ऐसे-ऐसों के चक्कर में

पड़ चुका हूं ऐसे-ऐसों के चक्कर में।
कुत्ते गधे भी नहीं ठहरते जिनकी टक्कर में।।

अपनी तारीफ़ खुद करके बनते हैं मियां मिट्ठू।
पीठ पर लादे फिरते हैं जलनखोरी के पिट्ठू।।

औरों की क्षमता से जलते रहते हैं रात-दिन।
बद-तमीजी की रायफल पर चढ़ाए रहते कमीनेपन की संगीन।।

जब तब टांग अड़ा कर हासिल कर लेते हैं सरप्राइज।
काली करतूतों की कालिख से करते हैं केमोप्लाइज।।

            -  किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                   पी. टी. एस.,माना
                         2001

©सर्वाधिकार सुरक्षित।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

उम्मीद अभी जिंदा है।

उम्मीद अभी जिंदा है।
….
....
....
दिल ख्वाहिशों की गठरी है।
मन अरमानों का पुलिंदा है।
कुछ तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

माना कि गहरा तम है
और उजियारा कम है।
हर दिल है गमजदा
और आंखें भी नम हैं।।
मायूसी में भी आस जगाता
कोई तो बंदा है।
कभी तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

जिम्मेदारियां न हुईं पूरी।
हसरतें भी रह गईं अधूरी।
लाख दर्द छुपाकर
लबों पे मुस्कान जरूरी।।
अपनी नाकामी पर
यह जन शर्मिंदा है।
कभी तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

सच-झूठ के पैमाने बदल गये।
सफलता के माने बदल गये।
कुछ तो जानबूझकर
कुछ अनजाने बदल गये।।
मायूसी के आलम में भी
चहक उठता खुशियों का परिंदा है।
कुछ तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

दिनांक :- 07/02/2019

                  किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'
                          ग्राम - छीपा
                          राजनांदगांव

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

गुरुवार, 24 जनवरी 2019

मैं तो वही हूं

मैं ही हूं सही
यह बात कभी न कही।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

हर बात पर सहमत होना जरूरी नहीं।
हां में हां मिलाना मजबूरी नहीं।।
बहस भी तो मुनासिब है कहीं कहीं।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

माना कि हम सुधर न सके।
तेरी उम्मीदों पर खरा उतर न सके।।
मुझ में मेरा भी तो कुछ होगा
सब कुछ तेरा नहीं।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

हर दांव पर हम सम्हल न सके।
और वक्त के साथ बदल न सके।।
हालांकि तेरी कोशिश में
कोई कमी न रही।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

सारी दुनिया से बाखबर।
और खुद से है तू बेखबर।।
कोई तो रखता होगा
तेरी करतूतों का खाता-बही।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

          -- किशोरी लाल वर्मा'कुन्दन'
                       कुन्दनपाल
                   23/01/2019

© सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 21 नवंबर 2018

जज़्बात ऐसे उसने जगा दिया।
कि मेरे दिल ने मुझसे दगा किया।।

अब तक खुद पर गुरूर था बहुत
उसने मुझे उसूलों से डिगा दिया।

तन्हा था मैं खुद से पराया भी।
सारे जग का उसने सगा किया।।

उसकी दिल्लगी बहुत रास आई
दर्द सारा उसने भगा दिया।।

22/11/18
कुंदनपाल

रविवार, 1 अप्रैल 2018

हर मुश्किल हो जाता है आसान तुमसे बात होने से।

मेरी यह  रचना
जीवन संगिनी
श्रीमती शारदा वर्मा को
समर्पित है।

हर मुश्किल हो जाता है आसान,
तेरे साथ होने से।
मिट जाती है  थकान,
तुमसे बात होने से।।

जबसे तुमसे मीत हुई।
जिंदगी मधुर गीत हुई।।
सब कुछ मुमकिन लगता है
हाथों में तेरा हाथ होने से।
हर मुश्किल हो जाता है आसान
तेरा साथ होने से।।

तुम्हीं हो सूरज मेरी हर सुबह का।
चांद भी तुम्हीं हो रात होने से।।

हर मुश्किल हो जाता है आसान
तेरा साथ होने से।
मिट जाती है थकान
तुम से बात होने से।।

             - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

शनिवार, 26 सितंबर 2015

मेरे गाँव की पगडंडी

आसमान में
बिजली चमककर
जैसे स्थिर हो गयी हो;
हरियाली की पृष्ठभूमि में
वैसी ही उजली- उजली
यह पगडंडी
मेरे गाँव की ओर जाती है।

चलो यह ठीक है कि
इसमें माइलस्टोन नहीं है ;
पर इसकी हरेक मोड़ पर 
अपने खेत की मेड़ पर बैठकर 
बढ़ती हुई फसल को 
वात्सल्यपूर्ण दृष्टि से निहारते हुए
वृद्ध किसानों का अभिवादन प्राप्त कर 
अवश्य प्रसन्न होओगे। 

चलो यह भी ठीक है कि 
इसमें जगह -जगह प्याऊ नहीं है। 
पर झुरमुटों को पार कर
जैसे ही क्षीणधारा स्रोतस्विनी के जल को पीने झुकोगे
तो  वहां स्नान करती ग्रामबालाओं के
स्वाभाविक मुख सौंदर्य को देखकर
अवश्य तृप्त होओगे। 

और जैसे ही 
मेरे गाँव की गली में प्रविष्ठ होओगे
वहाँ धूल में
नंगे पाँव नंगे
बदन खेलते हुए 
इस देश के भविष्य को देख सकते हो। 
इसलिए मित्र मेरे गाँव आना 
और इसी पगडंडी से आना। 
                            
                                               किशोरी लाल वर्मा 

कांक्रीट के जंगल से उगता सूरज


सभी करते हैं सलाम
उगते सूरज को।
मैं भी करना चाहता हूँ --
सन सैल्यूट ,
सूर्य नमस्कार , 
उगते सूरज को।
पर मेरे सामने 
कभी नहीं होता उगता सूरज।
मुझे दिखाई देता है सूरज
उग आने के काफी बाद ।
कांक्रीट के जंगलों से ऊपर आया
गुस्से में तमतमाया सूरज
घूरता है मुझे 
सातवें आसमान से।
क्योंकि 
उसका उदयाचल और अस्तांचल छीनने में 
मेरा भी हाथ है 
कुछ न कुछ।


                                                                  
                                                          किशोरी लाल वर्मा