गुरुवार, 7 मई 2020

बहरों को आवाज मत दो

बहरों को आवाज मत दो।

भाई! आपने हम लोगों को गूंगे समझ लिया इसमें आपकी कोई खता नहीं है। सब को पता है कि हम अपनी खुद की तकलीफों पर भी नहीं बोलते। कभी हम अपने दर्द की परतें नहीं खोलते। पर राज की बात बताऊं कि हम कभी गूंगे नहीं रहे। आपने हमें गूंगे जान कर हमारी आवाज बनने की कोशिश की इसके लिए हम शुक्रगुजार हैं। हमारा गूंगापन हमारी कमजोरी की निशानी कतई नहीं है। और हां। हमारे दर्द को आप आवाज भी दे दोगे तो भी कोई फायदा नहीं क्योंकि जिन्हें सुनना है वे बहरे हैं। पूरी तरह से तो बहरे नहीं हैं क्योंकि अपने मतलब की हर बात अच्छी तरह सुन लेते हैं। लेकिन जो उनके मतलब का नहीं उस बारे में तो कुछ भी नहीं सुन पाते। तो भाई! आप हमारी मजबूरी के गूंगापन पर तरस खाए इसके लिए फिर से धन्यवाद! लेकिन ये बहरे जरा भी नहीं सुनेंगे चाहे आप कितना भी ऊंचा बोलें। इसलिए मेरे बंधु! बहरों को आवाज मत दो।

                    ‌         - 'कुन्दन'

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