बड़ जतन से बोएन धान।
बिन पानी छूटत हे परान।।
बरसा के चार महीना घूमन मोरा में।
अब सावन बीतगे बादर के अगोरा में।।
तरिया नंदिया सब सुख्खा परगे
कभू सब ल पूरा-पानी नहकान।
बिन पानी छूटत हे परान।।
धनहा डोली में अब नइ तंउरे अइरी।
मेचका के नइ हे टेट-टेरी बोर-बोरी।।
गाय-गरु घलो हे हलाकान।
बिन पानी छूटत हे परान।।
खेत में बनिहारीन के गीत नइ हे।
मौसम अब हमर मीत नइ हे।।
पहिली बरसत पानी में नहान।।
अब बिन पानी छूटत हे परान।।
बड़ जतन से बोएन धान।
बिन पानी छूटत हे परान।।
किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
26/07/2019
मुरागांव (कोरर) कांकेर।
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