विरोध का मर्म।
विरोध के स्वर को सहना,सुनना,समझना तथा समझौते और समाधान की ओर अग्रसर होना एक अच्छे लोकतांत्रिक राष्ट्र की पहचान है। यदि विरोध को बल पूर्वक दबा दिया जाता है तो उसके देर-सबेर विद्रोह में परिवर्तित होने की आंशका बनी रहती है क्योंकि किसी भी समुदाय के असंतोष की भावना को अनंतकाल तक टाला नहीं जा सकता। कभी न कभी सम्मानजनक समझौते की स्थिति में पहुंचना ही होगा। संवाद अर्थात् बातचीत ही समाधान पर पहुंचने का सीधा और सरल राजमार्ग है। अन्य रास्ते टेढ़े-मेढ़े और कष्टप्रद हैं।
बात नंदीराज पहाड़ की रक्षा के लिए डटे दक्षिण बस्तर के आदिवासियों के आन्दोलन के संदर्भ में हो रही है। दरअसल अब तक बस्तर का इतिहास सतत शोषण और दोहन का इतिहास रहा है। अन्नम देव के समय से या उससे भी पहले से इस क्षेत्र में तेलुगु भाषा-भाषी लोग प्रभावी रहे हैं और तब से लेकर अब तक स्थानीय मूल निवासी दोयम दर्जे से भी बदतर निम्न स्तर की जिंदगी जी रहे हैं। बस्तर में अब तक जो भी बाहरी लोग आए ,लगभग सभी ने आदिवासियों की सरलता का गलत फायदा उठाया। चाहे वे अँगरेजों के नुमाइंदे हों या मराठी बंजारे,चाहे बांग्लादेशी शरणार्थी हों,चाहे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हों या चाहे भारत के अन्य भागों में अपराध करके बस्तर के घने जंगलों में छिपे पापी या उनकी संतानें हों और चाहे नक्सली ही हों; सबने बस्तर और बस्तरिहों को दोनों हाथों से लूटा। सबने उनकी सिधाई का लाभ उठाया।
जिन्होंने पुरापाषाणकाल से लेकर अब तक जंगलों पहाड़ों में अपनी सभ्यता को विकसित किया, अपनी संस्कृति को पल्लवित-पुष्पित किया, उनके प्राकृतिक रहवास को विकास के नाम पर धीरे-धीरे कुतर कर समाप्त किया जा रहा है। उन्होंने तो विकास की मांग नहीं की है। भोंडा विकास उनको नहीं सुहाता। एक तरफ महानगरों में शुद्ध वायु सेवन के लिए आक्सीजोन बनाए जाते हैं दूसरी ओर वनवासी क्षेत्रों में प्रदूषण फैला रहे हैं। यह तो परले दर्जे का दोगलापन है। आदिवासी ऐसे विकास को दूर से भी नमस्कार नहीं कर रहे हैं तो फिर उन पर जबरन लादा जाना अनुचित है। यहां तो हर पेड़ में देव का निवास है जबकि पूरे पहाड़ को समाप्त कर देने की बात हो रही है।
तथाकथित आधुनिक लोगों को प्रभु इतनी सद्बुद्धि जरूर दे कि भोले-भाले वनवासियों के सहज पर्यावरणीय बोध को दकियानूसी सोच समझने की गलती नहीं करें।
जय जोहार!
डिस्क्लैमर:- कृपया राजनीति प्रेरित वक्तत्व से बचें।
12/06/19
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