वंदे मातरम्।
भारत माता की जय।
ये सब ऐसे नारे हैं जिन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान देश के करोड़ों लोगों को राष्ट्रीयता की भावना से अनुप्राणित किया तथा आजादी के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने के लिए प्रेरणा दी। आज भी ऐसे नारों के उद्घोष से जन-समूह देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत हो जाता है। देश प्रेम की भावना को अभिव्यक्त करने वाले ऐसे नारों का उपयोग अच्छी बात है क्योंकि आम जनता ऐसे ही नारों और पोस्टरों से प्रेरित होती है।
लेकिन जो व्यक्ति या समूह इन नारों का इस्तेमाल नहीं करता क्या वह देशभक्त नहीं है। मैं नहीं समझता हूं कि देश भक्ति की भावना केवल नारों तक सीमित है। छाती पीट-पीट कर चिल्लाने और दिन-रात पाकिस्तान जैसे घटिया मुल्क को कोसते रहने से ही हम देशप्रेमी नहीं हो जाते। आजादी की लड़ाई के दौरान और उसके बाद भी भारत में अनेक ऐसे नेता हुए जिन्होंने ऐसे नारों का इस्तेमाल नहीं किया लेकिन उनकी देशभक्ति की भावना पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकते। चिल्ला-चिल्ला कर देशभक्ति व्यक्त करना भी जरूरी नहीं है। एक मजदूर दिन भर मेहनत करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता है और किसी का अहित नहीं सोचता। क्या यह देश प्रेम नहीं है? किसान, शिक्षक, प्रशासक, राजनेता, बुद्धिजीवी आदि सब अपने-अपने कर्त्तव्यों में रत हैं। यही देश सेवा है। यही राष्ट्रप्रेम है।
जो सिर्फ़ और सिर्फ़ देश के लिए जीता और मरता है ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम होगी। अन्यथा अधिकतर जनसंख्या रोजी रोटी और रोजमर्रा की दीगर जरूरतों को पूरी करने में ही अपना जीवन खपा देती है। इसमें राष्ट्रद्रोह जैसी बात कहां से आ जाती है? लेकिन भारतीय समाज में बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो खुद को देशभक्ति के स्वयंभू रखवाले मानते हैं। अगर राष्ट्रवाद के ये ठेकेदार लोगों को पकड़-पकड़ कर वंदे मातरम् बोलवाने की कोशिश करें तो कहां तक जायज है? हमारे यहां एक गलत बात यह भी होती है कि कुछ विशेष वर्ग के लोगों से बात-बात पर देशभक्ति का सबूत मांगते हैं। जो गद्दार हैं। जो देश को तोड़ने के सरेआम नारे लगाते हैं उनका तो कुछ कर नहीं पाते। लेकिन आम लोगों को नाहक परेशान करते रहते हैं तथा अल्पसंख्यकों के बारे में ऐसी राय रखते हैं जैसे वे भारतीय नहीं होकर शरणार्थी हों। जब तक विपरीत प्रमाण नहीं मिलता किसी को भी किसी अन्य की देशभक्ति पर संदेह करने की जरूरत नहीं है। दर असल राजनीतिक स्वार्थों ने देश के नाज़ुक सांप्रदायिक सौहार्द्र को असंतुलित कर रखा है। देश की मीडिया भी नकारात्मकता के अंध महासागर गोते लगा रही है। उसका राष्ट्रवादी चरित्र समाप्त हो चुका है। आज मीडिया न तो निष्पक्ष है और न ही प्रतिबद्ध है। सोशल मीडिया में भी अनुत्तरदायित्वपूर्ण नकली खबरों की भरमार रहती है। इसलिए बहकावे में नहीं आएं। और सामाजिक समरसता को बढ़ाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास करें।
जय हिन्द!
मंगलवार, 30 जुलाई 2019
राष्ट्रवाद और नारे
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