मैं बस से सुकमा जा रहा हूं। कहने को तो केशलूर से कोंटा रोड नेशनल हाईवे है लेकिन यह आज भी टू-लैन है; कई स्टेट हाइवे से भी गया गुजरा। गुप्ता ट्रैवल्स की मिनी बस ठसाठस भरी हुई है। अधिकतर सवारी स्थानीय आदिवासी ही हैं; निहायत सीधे, सरल और सज्जन लोग। बहुत से लोग जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं माखूर दबाए हुए हैं। कई तो मंद पी के सुबह से 'माते' हुए हैं। बस में गाना भी कंडक्टर च्वाइस वाले बज रहे हैं जिन्हें बर्दाश्त करते-करते मैं झुंझला चुका हूं। लेकिन अब किशोर कुमार का उडलई उडलई वू... बज रहा है,अन्यथा मैं गाना बंद करने का फरमान जारी कर चुका होता जिसकी शायद ही तामीली होती। चिल्लपों और दमघोंटू माहौल में 'सफर' कर रहा हूं। लेकिन जब बस चलती रहती है तभी सुखद यात्रा का भान होता है। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है। ऊपर से यह गाना "चला जाता हूं किसी की धुन में धडकते दिल के तराने लिए.."। संयोग से मुझे खिड़की वाली सीट भी मिल गई है। दरभा घाटी की जैवविविधता और प्राकृतिक सुन्दरता को देखते-देखते कब झीरम घाटी आया पता ही नहीं चला। अब दरख्तों और पहाड़ों की सुंदरता की जगह कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेडों के स्मारकों ने मेरा ध्यान खींच लिया जो नेशनल हाईवे के किनारे पर बनाए गए हैं। मैं जब-जब इन स्मारकों को देखता हूं तो नक्सलियों के बारे में सोचने लगता हूं। झीरम गांव कई पारा या टोलों का समूह है। कम से कम तीन टोले तो हाईवे पर ही हैं। यही वह जगह है जहां पर बहुत से बेगुनाह लोग भी नक्सलियों की सनक के शिकार हुए थे। मैं जब-जब झीरम से गुजरता हूं तब-तब कोरकोट्टी-मदनवाड़ा की कसक गहरी हो जाती है जिसमें हमने अपने बेहतरीन कप्तान श्री विनोद चौबे को खो दिया था। यह बहुत बड़ी विभागीय क्षति थी। और जब-जब कोरकोट्टी-मदनवाड़ा की घटना को याद करता हूं तो मुझे झीरम हत्याकांड की भी दुखद याद ताजी हो जाती है। कभी-कभी लगता है कि झीरम कांड(25 मई, 2013) और कोरकोट्टी-मदनवाड़ा कांड(12 जुलाई,2009) एक ही दुखान्त नाटक के दो एपीसोड हैं, हालांकि कि दोनों में देश और काल का लंबा अंतराल है।
21/06/2019
मंगलवार, 9 जुलाई 2019
सुकमा यात्रा
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