जातिवाद को मैं भारतीय समाज का कलंक मानता हूं। जाति व्यवस्था जन्म के आधार पर भेदभाव का पोषण करती है तथा समाज के कुछ समूहों को बहुत से अधिकारों और सुविधाओं से वंचित रखती है। अगर हिंदुस्तान में जो चीजें या चलन संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ हैं तो उनमें जातिवाद सबसे आगे है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता तथा स्वतंत्रता और अवसर की समता हमारे संविधान के बुनियादी ढांचे की कुछ मुख्य विशेषताएं हैं। जाति व्यवस्था हमारे संविधान की इसी मूल भावना के ठीक विपरीत है। सरल शब्दों में कहें तो जातिप्रथा संविधान के ही खिलाफ है। यह अत्यंत शर्म की बात है कि इसे हम आज भी बर्दाश्त कर रहे हैं, ढो रहे हैं। वैसे अन्य अनेक बातें हैं जिन्हें सभ्य समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता लेकिन जातिप्रथा सबसे अधिक खतरनाक है। जब देश का बहुसंख्यक समुदाय हिंदू ही हजारों टुकड़ों में खंडित है तब फिर हम अव्वल दर्जे की कौमी एकता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
अब ऐसी बातों का समर्थन करने का दौर नहीं रहा। इसे जड़ से उखाड़ना न केवल जरूरी है बल्कि संभव भी है।
तुर्की के जननायक अतातुर्क कमाल पाशा ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में अपने देश में व्याप्त दकियानूसी सोच और सभी तरह के कठमुल्लापन को समाप्त कर दिया था। इससे कुछ वर्गों को तकलीफ़ जरूर हुई लेकिन इतिहास में कभी 'यूरोप का मरीज' के नाम से कुख्यात तुर्की आज समृद्ध राष्ट्र है। हमें भी किसी 'युवा तुर्क' का इंतजार है जो देश से घिनौनी सामाजिक बुराइयों को एक झटके में खत्म करने का 'कमाल' कर सके।
डिस्क्लेमर :- कृपया राजनीति प्रेरित टिप्पणी करने से बचें।
27/05/19
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें