मंगलवार, 9 जुलाई 2019

नंदीराज विरोध

नंदीराज विरोध

पारंपरिक नृत्य करते हुए विरोध!
इससे अधिक शांतिपूर्ण तरीका और क्या होगा?
कुछ बुद्धिजीवियों को अब तक यह शिकायत रही है कि आदिवासी इलाकों में विशेषकर बस्तर आदि क्षेत्रों में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हेतु सशस्त्र विद्रोह जैसे हिंसक और गैर लोकतांत्रिक तरीके अपनाए जाते रहे हैं। यहां सशस्त्र संघर्ष का लंबा इतिहास रहा है तथा यहां के लोग शांतिपूर्ण विरोध के तरीकों से परिचित नहीं हैं। लेकिन बात तो इसके ठीक उल्टी है। मतलब जब शांतिपूर्ण ढंग से सुनवाई नहीं होती तब हिंसात्मक होने का खतरा बढ़ जाता है। हमें शिकायत रही है कि बस्तर वासी अपनी मांगों को बताते नहीं है व्यक्त नहीं करते, सीधे एक्शन लेते हैं। आज वे चिल्ला-चिल्ला कर बता रहे हैं।नाच-गा कर जता रहे हैं। अब भी बहरे बने रहें तो अनर्थ हो जाएगा। धीमी आवाज को नहीं सुन पाए तो ऊंची आवाज सुननी पड़ेगी या फिर सुनने लायक कुछ रह नहीं जाएगा। अभी इनको सुन लेने से लोकतंत्र और मजबूत होगा। अन्यथा वही होगा जो नक्सली चाहते हैं।
            चाहे कोई भी शासन प्रणाली हो, लोकतंत्र हो या साम्यवादी शासन या राजतंत्र ही क्यों न हो; जनता ही शक्ति का केंद्र होती है। जनमत जिसके साथ है वही सिकंदर होगा। नक्सलियों को हराने के लिए जनता के बीच जाना जरूरी है। अब जनता खुद सामने आ गई है तो उसकी कद्र करना बहुत जरूरी है। जनमत की अवहेलना से तो बड़े-बड़े साम्राज्य बिखर गए। गरीब,बेबस और मजबूर लोगों को कमजोर समझने की गलती आज नहीं तो कल भयंकर पछतावा लायेगी।
         पर्यावरण संरक्षण के नाम पर अरबों रुपए खर्च किया जाता है। वह भी इस अव्यवहारिक तरीके से कि उसका कोई प्रतिफल नहीं मिलता। लेकिन अब जब प्रकृति की संतानें जंगलों और पहाड़ों की रक्षा करने के लिए खुद आगे बढ़कर आ रही हैं तो उनका सम्मान किया जाना चाहिए। याद रखें कि उन्होंने हजारों वर्षों तक पर्यावरण की रक्षा की है, प्रकृति की पूजा की है। जगंल-पहाड़ आदि वनवासी समुदाय की संपत्ति है। इसलिए यहां किसी भी तरह की बाहरी गतिविधियां उनकी सहमति और सहभागिता के बिना नहीं होनी चाहिए।
आदिवासियों की तकनीक और जीवन शैली प्रकृति के सर्वाधिक निकट और पर्यावरण के अनुकूल हैं। इसलिए हमें उनका, उनकी परम्पराओं और संस्कृति का दिल और दिमाग से सम्मान करना चाहिए।

जय जोहार!

डिस्क्लेमर:- कृपया राजनीतिक वक्तव्य से बचें।
11/06/19

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