हम रोज देखते हैं
सभ्य होने का दावा करने वाले
सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के ढोल पीटने वाले
निरा पशु को
आदमी का मुखौटा लगाये
आदमी के वेश में
आदमियों के बीच।
मानवरूपधारी यह दानव
अपनी छल की ढॉड़ों से
मनुष्य की अस्थि को
बटेर की टांग की तरह चबा डालता है।
उसकी लोभ वृत्ति
कुत्ते की जीभ की तरह लंबी और
आग की लपटों सी लपलपाती है।
हे! महाविज्ञानी!चार्ल्स डार्विन!!
इंसान
जिसे आपने
बन्दर की औलाद कहा था
बन्दर से भी
नीच नासमझ होता जा रहा है
विकासवाद के विरुद्ध
आदमी जानवर होता जा रहा है
आदमी जानवर होता जा रहा है।
किशोरी लाल वर्मा
सभ्य होने का दावा करने वाले
सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के ढोल पीटने वाले
निरा पशु को
आदमी का मुखौटा लगाये
आदमी के वेश में
आदमियों के बीच।
मानवरूपधारी यह दानव
अपनी छल की ढॉड़ों से
मनुष्य की अस्थि को
बटेर की टांग की तरह चबा डालता है।
उसकी लोभ वृत्ति
कुत्ते की जीभ की तरह लंबी और
आग की लपटों सी लपलपाती है।
हे! महाविज्ञानी!चार्ल्स डार्विन!!
इंसान
जिसे आपने
बन्दर की औलाद कहा था
बन्दर से भी
नीच नासमझ होता जा रहा है
विकासवाद के विरुद्ध
आदमी जानवर होता जा रहा है
आदमी जानवर होता जा रहा है।
किशोरी लाल वर्मा

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