सन् 1942 के 8/9 अगस्त की मध्य रात्रि में बम्बई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान से जब महात्मा गांधी ने 'अँगरेजों भारत छोड़ो' की आवाज बुलंद किया तो ऐसा लगा जैसे उनके अंदर से पराधीन भारत की 30 करोड़ जनता बोल रही है। बी. पट्टाभि सीतारमैय्या की बात मानें तो जैसे उस समय कोई देवदूत बोल रहा था।जैसे ही उन्होंने 'करो या मरो' का नारा दिया; लोगों की रगों में बिजलियाँ दौड़ गयी। पूरा देश;सारी जड़ता और कमजोरी को फेंक कर इस कदर खड़ा हो गया कि सभी बड़े नेताओं के कैद हो जाने के बावजूद भारत की जनता ने अँगरेजों के छक्के छुड़ा दिए। नतीजन कुछ देर से ही सही मजबूरन अँगरेजों को भारत छोड़ना ही पड़ा।
आज की पीढ़ी गाँधीजी के योगदान को सही तरीके से समझ नहीं पाती। क्योंकि उन्हें इतिहास की ठीक-ठाक जानकारी नहीं दी गई। भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में बात की जाए तो सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि गाँधीजी को छोड़कर किसी भी बड़े राजनीतिक दल का कोई भी नेता यह नहीं चाहता था कि उस समय अँगरेजों के खिलाफ कोई आंदोलन चले।
स्वयं कांग्रेसियों ने गाँधीजी के भारत छोड़ो के प्रस्ताव का विरोध किया। तब गाँधीजी ने धमकी दिया कि वह 'देश की बालू से कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे'। गाँधीजी तो सविनय अवज्ञा आंदोलन के बाद ही कांग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र दे चुके थे। इस धमकी से तो कांग्रेसियों के पैरों तले जमीन ही खिसक गयी। मजबूरन वर्धा अधिवेशन में गाँधीजी के भारत छोड़ो प्रस्ताव को स्वीकृति देनी पड़ी।
पंडित नेहरू भी नहीं चाहते थे कि अँगरेज जो नाजीवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं उनको मुसीबत में डाला जाए। और जब उनका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी सुभाषचंद्र बोस जर्मनी-जापान की सहायता से कुछ सफल होकर जनता के हीरो बन गए थे तो वह अँगरेजों के समर्थन में और सुभाषचंद्र के खिलाफ खुद तलवार उठाने तक की बात कर गए।
साम्वादियों की सहानुभूति सोवियत रूस के साथ थी जो अँगरेजों की तरफ लड़ रहा था।उन्होंने(कम्युनिस्टों ने) भारत छोड़ो आंदोलन का इतना ज्यादा विरोध किया था कि जनता कम्युनिस्ट का अर्थ देशद्रोही समझने लगी थी।
मुस्लिम लीग, उदारवादी दल, हिन्दू महासभा तथा डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर ने भी अपने-अपने संकुचित दृष्टिकोणों और निहित स्वार्थों के आधार पर भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया।
तो क्या केवल महात्मा गाँधी जनता की आशाओं-आकांक्षाओं को समझ पाये बाकी नेता नहीं समझ पाये? नहीं; वे भी अच्छी तरह जानते समझते थे कि देश की जनता को हर हाल में आजादी चाहिए परंतु वे नेता ऐसी आजादी हरगिज नहीं चाहते थे जिसमें वे अपनी राजनीतिक रोटी न सेंक सकें।
रविवार, 8 अप्रैल 2018
भारत छोड़ो आन्दोलन
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