न सिलेबस दिखाती है, न समय दे जाती है।
जब तेरा जी चाहता है, जिंदगी! तू आजमाती है।।
कब तक खरा उतर पाऊंगा तेरी परीक्षाओं में;
हर बार पहले से भी कठिन सवाल उठाती है।।
औरों को बख्श देती है नाकाबिल समझकर;
मेरे लिए ही नई नई चुनौतियां लेकर आती है।।
मुझे तराशने में क्यों हो तुम इतना मशगूल ?
इस अदने से इंसान पर तरस नहीं खाती है।।
न सिलेबस दिखाती है, न समय दे जाती है।
जब तेरा जी चाहता है जिंदगी! मुझे आजमाती है।।
-- किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
21/09/2019
मुरागांव, कोरर, कांकेर
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