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गुरुवार, 14 नवंबर 2019

सच में तेरा आना होगा?

सच में तेरा आना होगा?
या फिर नया बहाना होगा??

आकर कुछ ठहरोगे भी
कि आते ही जाना होगा?

मेरे जज़्बात की कदर न सही
अपनी पसंदगी तो बताना होगा।

तुमसे है कितनी मुहब्बत
क्या यह भी जताना होगा?

फब्तियों के तीर चला लेना
मेरा दिल फिर निशाना होगा।

तू नहीं, तेरा इन्तजार ही सही;
रिश्ता तो मुझे निभाना होगा।

सच में तेरा आना होगा?
या फिर नया बहाना होगा??

           - किशोरी लाल वर्मा'कुन्दन'
                  11/09/2019
                   मुरागांव, कांकेर

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

रविवार, 4 अगस्त 2019

मुहझुलझुल से मोला मुंधियार होगे

बड़   लम्बा   तोर    इंतजार     होगे।
मुहझुलझुल से मोला मुंधियार होगे।।

आहूं-आहूं कहिके आज घला नइ आए।
सम्मार   से   तोला   शुकरार   होगे।।

कुंवरबोड़का कहिके भौजी मन कुड़काथे।

तोर अगोरा में जवानी खुआर होगे।।

कोनों  ल  अतिक  भाव मैं देवव  नहीं;
फेर दिल तोर बर कइसे बेकरार होगे।।

मया पीरा थोरिकिन नई समझे

बेदर्दी से मो ला कइसे प्यार होगे?

तो ला नइ देखहूं ते जीव छूट जाही;

तोर दरस मोर प्रान के अधार होगे।।

बड़   लम्बा   तोर    इंतजार     होगे।
मुहझुलझुल से मोला मुंधियार होगे।।

          किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
               03/08/2019
           मुरागांव (कोरर), कांकेर।

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रविवार, 9 दिसंबर 2018

बातें न गोल-गोल कर

देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

ऐसे न वक्त जाया कर;
सीधे मुद्दे पर आया कर।
दिल में है वही बताया कर;
नाहक न बातें घुमाया कर।।
खुरदरी बातें भी अच्छी होती हैं;
सपाट न बना छोल-छोल कर।।
देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

तुम्हारी ये झूठी मुस्कान
नहीं छुपा सकती असली पहचान।
चेहरा कुछ और कहता है
जुदा है तेरी जुबान।।
झूठी तारीफों से बेहतर होगा
कि शिकवा करो दिल खोल कर।
देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

                 - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                         09/12/2018
                             कुंदनपाल

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

शनिवार, 22 सितंबर 2018

कलमकार हूं इंकलाब का

गीत लिखूं मैं कैसे तुम्हारे इकबाल का?
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

हां मैं अदना-सा इन्सान हूं;
पर कलम में समाया हुआ तूफान हूं।।
एहसास दिलाना बाकी है दिल में छुपे सैलाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

हर तरफ अशांति है फिर अमन के गीत कैसे गाऊं ?
मैं तो ठहरा सतह का आदमी शिखरों को कैसे गले लगाऊं ‌?
अनगिनत सवालों का पुलिंदा मैं, इंतजार है जवाब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

मुझको तेरा कुछ भी नहीं भाता है।
जन-जन से मेरा नाता है।
तारीफ में एक लफ्ज़ नहीं निकलेगा
मैं तो एक पन्ना हूं बगावत की किताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।

सबकी उम्मीदें तार-तार है।
जनता आज जार-जार है।
बागी हुई कलम मेरी, काम नहीं करेगी तुम्हारी ढाल का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

अपनी शानो-शौकत में होकर तुम मशगूल।
लोगों को समझते हो चरणों की धूल।।
कम नहीं आंकना जुगनुओं को
साथ चमकेंगे तो उजाला होगा आफताब का।
मैं तो कलमकार हूं इंकलाब का।।

          - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

रविवार, 16 सितंबर 2018

जब से आया है तेरा पैगाम।


जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।
दिन-रात तुम्हें याद करना
इसका बस एक काम।

मन मचलता है
पास तुम्हारे आने को।
दिल है बेकरार
हर खतरा उठाने को।।
भाता नहीं है मुझे
तेरे शिवा कोई नाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।।

खींचा चला आता हूं
तेरी ही ओर।
तू ही है
मेरी चाहत की छोर।।
तुझे पाने की जिद में
भूल जाता हूं अंजाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।।

जब तुमसे बात हुई।
हसीन मुलाकात हुई ।
दिल की जमीं पर
खुशियों की बरसात हुई।।
दिन मेरे उजले हुए
सुहानी हो गई हर शाम।
जब से आया है तेरा पैगाम।
दिल हुआ बेलगाम।
दिन-रात तुम्हें याद करना
इसका बस एक काम।।

                - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

© सर्वाधिकार सुरक्षित।