फिनलैंड में हिमादास ने 400 मीटर दौड़ में इतिहास रच दिया। लेकिन उनको उस तरह का सम्मान, पुरस्कार और वाहवाही नहीं मिली जिस प्रकार क्रिकेटरों या अन्य खेलों के खिलाड़ियों को दिया जाता है। इतिहास में कभी कभी ऐसा भी होता है कि हिमा जैसी शख्सियत सिस्टम के किसी हिस्से के योगदान के बिना भी ऊंचाइयों पर पहुंच जाती हैं। और यह बात भी उन लोगों के लिए तकलीफ़देह होती है जो खेलतंत्र पर कब्जा जमाए बैठे हुए हैं। तामझाम वाली कोचिंग के बिना ही सुदूर पूर्व की अत्यंत साधारण ग्रामीण-बाला कैसे विश्वविजयिता बन गई? यह उनके पेट में दर्द का भी एक कारण है। हिमादास की सफलता ने द्रोणाचार्यों का हाजमा खराब कर दिया है। दरअसल हमारे देश और विदेशों में भी एकलव्यों को कभी भी वाजिब सम्मान नहीं मिला। विनोद गनपत कांबली में सचिन रमेश तेंदुलकर से ज्यादा प्रतिभा थी लेकिन क्रिकेट के द्रोणाचार्य रमाकांत आचरेकर का आशीर्वाद तेंदुलकर के साथ था। बात यहीं तक खतम नहीं हो जाती। आज के बाजारीकरण के दौर में गुरु-परम्परा को भी हतोत्साहित किया जाता है। ओडिशा का गरीब बालक बुधिया आप सबको याद ही होगा। उसके गुरु बिरंचीदास की हत्या कर दी गई। हिमादास को पहचान कर फुटबाल के खेल से एथलीट की ओर मोड़ने वाले निपुन दास ही हैं। लेकिन उनको प्रचारित नहीं किया गया क्योंकि इनकी कार्य प्रणाली आर्थिक लूट-खसोट और भेदभाव पर आधारित खेल अकादमियों के खिलाफ है। इसी कारण सद्गुरुओं को द्रोणाचार्य बनने नहीं दिया जाता।
बात हिमादास से शुरू हुई थी। वास्तव में हिमा दास की पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व विज्ञापन और प्रचार पर आधारित बाजारवाद से मेल नहीं खाते। उसे विश्व चैंपियन बनने के लिए दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता आदि महानगरों में महंगे खेल अकादमियों में प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं पड़ी। उसे किसी नामचीन कोच की भी जरूरत नहीं पड़ी। चावल से बने भात खा कर फिनलैंड की धरती पर तिरंगा लहराने वाली लड़की से नामी-गिरामी ब्रांडो के प्रोटीन पाउडर और एनर्जी बूस्टर का विज्ञापन कैसे हो पाएगा ? अत्यंत साधारण नाकनक्श वाली श्यामवर्णी बालिका से सौंदर्य उत्पादनों का विज्ञापन वे लोग कैसे करा पाएंगे? यह बाजार से जुड़े हुए लोगों की समस्या है। लेकिन देश की आम जनता हिमा दास की सफलता से गदगद है। असम में धान की खेतों के कीचड़ में खिला कमल आज पूरे देश की शोभा बन चुका है। हम गुरु निपुन दास को प्रणाम करते हैं जो तमाम बाधाओं को पार कर हिमा जैसी प्रतिभा को बिना किसी स्वार्थ के दुनिया के सामने ले आए।
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
हिमादास
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