कुछ लोग बेहतरीन होते हैं। अपनी अतिरिक्त अच्छाइयों की वजह से सिस्टम के ढाँचे में फिट नहीं हो पाते। उनकी वैसी हालत होती है जैसी हालत नमक की बोरी में पड़े हुए दाल के कुछ दानों की होती है। ऐसे में व्यक्ति यह सोच बनाने लगता है कि मेरे अंदर भी थोड़ा सा भी कमीनापन होता तो शायद मैं बेहतर स्थिति में होता। गैरों से लड़ने के लिएे हमें तैयार किया गया है। परंतु मैं खुद को अपने ही लोगों के विरुद्ध पाता हूँ। मेरे अपने ही मेरे खिलाफ समस्त कुतर्कों के साथ खड़े हैं। बार-बार ऐसा लगता है कि मेरी कमजोरी ही समस्या की जड़ है। सबसे बड़ी कमजोरी है इंसानियत। इंसानियत का झंडा हाथ में लेकर तोप से टकराना है।
अच्छाई के पैमाने तेजी से बदल रहे हैं। मुझे आशंका है कि भविष्य में कहीं दूसरे प्रकार के लोग अच्छे न मान लिए जाएँ।
शुक्रवार, 27 जुलाई 2018
नमक की बोरी में दाल का एक दाना
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