कश्मीर-आजकल
छत्तीसगढ़ी कविता
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।
जेन ल अपन लइका समझ के मूँड़ मँ बोहेन
पड़ोसी ल बाप समझ के मेछरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।
जेन सेना के नाम से उँकर कका मन थर्राथे
ओकरे ऊपर पथरा बरसावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।
माछी समझ के जेन ला नई थपड़ायेन
वो नाक में खुसर के भुनभुनावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।
छींक परबो ते उँकर का गत हो ही
ये ला ओमन बिसरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।
केसर के कियारी ल खून से झन सींचे
नहीं ते उँकरो बारी आवत हे।
बने चेता दे भईया मंगलू!
ए मन अनते तनते जावत हे।।
सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।
----किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें