रविवार, 23 दिसंबर 2018

कश्मीर आजकल

कश्मीर-आजकल

छत्तीसगढ़ी कविता
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।

जेन ल अपन लइका समझ के मूँड़ मँ बोहेन
पड़ोसी ल बाप समझ के मेछरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

जेन सेना के नाम से उँकर कका मन थर्राथे
ओकरे ऊपर पथरा बरसावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

माछी समझ के जेन ला नई थपड़ायेन
वो नाक में खुसर के भुनभुनावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

छींक परबो ते उँकर का गत हो ही
ये ला ओमन बिसरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

केसर के कियारी ल खून से झन सींचे
नहीं ते उँकरो बारी आवत हे।
बने चेता दे भईया मंगलू!
ए मन अनते तनते जावत हे।।

सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

       ----किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'।

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