रविवार, 3 मार्च 2019

सलवा जुडूम का सच

सलवा जुडूम का सच

मई 2005 में कुटरू-फरसेगढ़ से एक जन आंदोलन शुरू हुआ जिसे सलवा जुड़ूम नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम का अर्थ है शांति के लिए संगठन या शांति के लिए युद्ध।पहली नजर में यह नक्सलियों के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों का सशस्त्र युद्ध था।तीर-कमान,कुल्हाड़ी आदि से लैस ये आदिवासी नक्सलियों तथा उनके समर्थकों के सफाये में लग गए।बस्तर के आदिवासियों ने वहाँ की या अपनी सुरक्षा स्वयं अपने हाथ में ले लिया।वे बस्तर के चप्पे चप्पे में लोगों और सामानों की आवाजाही पर नजर रखने लगे ताकि नक्सलियों की सप्लाई लाईन को काटा जा सके।बस्तर के आदिवासी खुदमुख्तार होने लगे थे।
                      1910 में बस्तर के आदिवासियों ने महान स्थानीय लड़ाका गुंडाधूर के नेतृत्व में अँगरेजों के बनाए व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था।जिसे भूमकाल नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम अपने सही अंजाम पर पहुँचता तो भूमकाल से भी महान होता।
                     तमाम कमियों,अभावों और कष्टों के बावजूद सलवा जुड़ूम सफलता की ओर अग्रसर था।दरअसल बस्तर में अब तक जो भी बाहरी लोग आए ,लगभग सभी ने आदिवासियों की सरलता का गलत फायदा उठाया।चाहे वे अन्नम देव के समय से बस्तर में वर्चस्व जमाये तेलगु भाषी हों, अँगरेजों के नुमाइंदें हों या गुड़ नमक के बदले बहुमूल्य वनोपज छीन लेने वाले व्यापारी हों,चाहे बांग्लादेशी शरणार्थी हों,चाहे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हों या चाहे भारत के अन्य भागों में अपराध करके बस्तर के बीहड़ जंगलों में छिपे पापी और उनकी संतानें हों और चाहे नक्सली ही हों।सबने बस्तर और बस्तरिहों को दोनों हाथों से लूटा। सबने उनकी सिधाई का लाभ उठाया।
                 सलवा जुड़ूम के समय भी बस्तर के आदिवासी छले गए।बस्तर के आदिवासियों का इस प्रकार जागरूक होना किसी को भी रास नहीं आया। बस्तर के आदिवासी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा कर इस आंदोलन को संगठित किया था।आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने अपना जंगल,जमीन सब कुछ हार कर सलवा जुड़ूम कैम्पों में रहने लगे थे।साधन हीन सुविधा हीन इन लोगों का किसी भी सामाजिक संगठन या सामाजिक वर्ग ने सहयोग नहीं किया।अलबत्ता जब 8अक्टूबर 2005 को अफगानिस्तान में भूकंप आया तो पूरे भारत से और छत्तीसगढ़ से भी सहायता सामग्री अफगानिस्तान भेजी गयी परंतु इन वनवासियों का किसी ने ख्याल नहीं रखा।केवल शासन ने देखभाल किया। बाकी सब तो दुःखी थे,भयभीत थे।उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसकती नजर आ रही थी। अगर उन्हें अपने स्वार्थ सिद्ध करते रहना था तो उनके हिसाब से सलवा जुड़ूम का विफल होना जरूरी था।सबसे पहले महेन्द्र कर्मा ने सलवा जुड़ूम को अपने हाथों में लिया।बस्तर में उनकी अगुवाई या सहभागिता के बिना कोई जन आंदोलन हो उन्हें कैसे मंजूर होता।सोढ़ी देवा नामक काल्पनिक व्यक्ति को सलवा जुड़ूम का सुप्रीम कमांडर बताया।यदि कोई वास्तविक व्यक्ति जुड़ूम का कमांडर इन चीफ होता तो बस्तर के नेताओं की वाट लग जाती।तुरंत आनन फानन में पक्ष विपक्ष एक होकर सलवा जुड़ूम जैसे जन आंदोलन को हथिया लिया।अब जुड़ूम को राजनेताओं की दया,शासन की नीतियों और कोर्ट के निर्णयों पर निर्भर कर दिया गया।एक बहुत बड़े जन आंदोलन की धार को असर दिखाने से पहले ही कुंद कर दिया गया।फिर न्यायालय का निर्णय आया कि आम जनता के किसी भी भाग का सशस्त्रीकरण नहीं किया जा सकता।इस तरह जुड़ूम को समाप्त कर दिया गया।आज बस्तर की जनता 2005से भी बदतर हालात में है। कुछ राजनीतिज्ञ खुद के बनाये चक्रव्यूह में फंस कर समाप्त भी हो गये लेकिन बहुत से लोगों की दुकानें अब भी बस्तर में नक्सली आतंक के कारण बदस्तूर चल रही है।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

उम्मीद अभी जिंदा है।

उम्मीद अभी जिंदा है।
….
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दिल ख्वाहिशों की गठरी है।
मन अरमानों का पुलिंदा है।
कुछ तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

माना कि गहरा तम है
और उजियारा कम है।
हर दिल है गमजदा
और आंखें भी नम हैं।।
मायूसी में भी आस जगाता
कोई तो बंदा है।
कभी तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

जिम्मेदारियां न हुईं पूरी।
हसरतें भी रह गईं अधूरी।
लाख दर्द छुपाकर
लबों पे मुस्कान जरूरी।।
अपनी नाकामी पर
यह जन शर्मिंदा है।
कभी तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

सच-झूठ के पैमाने बदल गये।
सफलता के माने बदल गये।
कुछ तो जानबूझकर
कुछ अनजाने बदल गये।।
मायूसी के आलम में भी
चहक उठता खुशियों का परिंदा है।
कुछ तो बेहतर होगा
यह उम्मीद अभी जिंदा है।।

दिनांक :- 07/02/2019

                  किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'
                          ग्राम - छीपा
                          राजनांदगांव

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गुरुवार, 24 जनवरी 2019

मैं तो वही हूं

मैं ही हूं सही
यह बात कभी न कही।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

हर बात पर सहमत होना जरूरी नहीं।
हां में हां मिलाना मजबूरी नहीं।।
बहस भी तो मुनासिब है कहीं कहीं।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

माना कि हम सुधर न सके।
तेरी उम्मीदों पर खरा उतर न सके।।
मुझ में मेरा भी तो कुछ होगा
सब कुछ तेरा नहीं।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

हर दांव पर हम सम्हल न सके।
और वक्त के साथ बदल न सके।।
हालांकि तेरी कोशिश में
कोई कमी न रही।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

सारी दुनिया से बाखबर।
और खुद से है तू बेखबर।।
कोई तो रखता होगा
तेरी करतूतों का खाता-बही।
तेरा नजरिया ही बदलता रहा
मैं तो वही हूं, वही।।

          -- किशोरी लाल वर्मा'कुन्दन'
                       कुन्दनपाल
                   23/01/2019

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रविवार, 23 दिसंबर 2018

कश्मीर आजकल

कश्मीर-आजकल

छत्तीसगढ़ी कविता
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।

जेन ल अपन लइका समझ के मूँड़ मँ बोहेन
पड़ोसी ल बाप समझ के मेछरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

जेन सेना के नाम से उँकर कका मन थर्राथे
ओकरे ऊपर पथरा बरसावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

माछी समझ के जेन ला नई थपड़ायेन
वो नाक में खुसर के भुनभुनावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

छींक परबो ते उँकर का गत हो ही
ये ला ओमन बिसरावत हे।
भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

केसर के कियारी ल खून से झन सींचे
नहीं ते उँकरो बारी आवत हे।
बने चेता दे भईया मंगलू!
ए मन अनते तनते जावत हे।।

सुन तो भईया मंगलू!
ए कश्मीर कोन डहन जावत हे।।

       ----किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'।

रविवार, 9 दिसंबर 2018

जब से उनका इजहार आया है

जब से उनका इजहार आया है।
चेहरे पर मेरे निखार आया है।।

खिल-खिल गई हूं मैं, जैसे
पतझड़ में बहार आया है।

मुद्दतों से जिसकी तलाश थी
आज वो दिलदार आया है।

धड़कनों ने  पुकारा था जिसे
नजरों में पहली बार आया है।

मिलेंगे तो जाने न दूंगी
यह खयाल सौ-सौ बार आया है।

जब से उनका इजहार आया है।
चेहरे पर मेरे निखार आया है।।

           -- किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                   03/12/2018
                      कुन्दनपाल

© सर्वाधिकार सुरक्षित

जंग अभी बाकी है

माना कि जिंदगी के अनेक रंग अभी बाकी हैं।
पर वतन के दुश्मनों से जंग अभी बाकी है।

कायदे से टकराते रहे हैं उनसे अब तक
लेकिन निपटने के कुछ ढंग अभी बाकी हैं।

और इम्तिहान न लें हमारे सब्र का
मृत्यु का नृत्य उनके संग अभी बाकी है।

उनके आकाओं को भी जहन्नुम पहुंचाए
वो हुड़दंग अभी बाकी है।।

वतन के दुश्मनों से जंग अभी बाकी है।
माना कि जिंदगी के अनेक रंग अभी बाकी हैं।

                   - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                         04/12/2018
                            कुन्दनपाल

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

बातें न गोल-गोल कर

देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

ऐसे न वक्त जाया कर;
सीधे मुद्दे पर आया कर।
दिल में है वही बताया कर;
नाहक न बातें घुमाया कर।।
खुरदरी बातें भी अच्छी होती हैं;
सपाट न बना छोल-छोल कर।।
देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

तुम्हारी ये झूठी मुस्कान
नहीं छुपा सकती असली पहचान।
चेहरा कुछ और कहता है
जुदा है तेरी जुबान।।
झूठी तारीफों से बेहतर होगा
कि शिकवा करो दिल खोल कर।
देख तू सीधे-सीधे बोल कर।
यूं न बातें गोल-गोल कर।।

                 - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                         09/12/2018
                             कुंदनपाल

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