मंगलवार, 9 जुलाई 2019

सुकमा यात्रा

मैं बस से सुकमा जा रहा हूं। कहने को तो केशलूर से कोंटा रोड नेशनल हाईवे है लेकिन यह आज भी टू-लैन है; कई स्टेट हाइवे से भी गया गुजरा। गुप्ता ट्रैवल्स की मिनी बस ठसाठस भरी हुई है। अधिकतर सवारी स्थानीय आदिवासी ही हैं; निहायत सीधे, सरल और सज्जन लोग। बहुत से लोग जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं माखूर दबाए हुए हैं। कई तो मंद पी के सुबह से 'माते' हुए हैं। बस में गाना भी कंडक्टर च्वाइस वाले बज रहे हैं जिन्हें बर्दाश्त करते-करते मैं झुंझला चुका हूं। लेकिन अब किशोर कुमार का उडलई उडलई वू... बज रहा है,अन्यथा मैं गाना बंद करने का फरमान जारी कर चुका होता जिसकी शायद ही तामीली होती। चिल्लपों और दमघोंटू माहौल में 'सफर' कर रहा हूं। लेकिन जब बस चलती रहती है तभी सुखद यात्रा का भान होता है। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है। ऊपर से यह गाना "चला जाता हूं किसी की धुन में धडकते दिल के तराने लिए.."। संयोग से मुझे खिड़की वाली सीट भी मिल गई है। दरभा घाटी की जैवविविधता और प्राकृतिक सुन्दरता को देखते-देखते कब झीरम घाटी आया पता ही नहीं चला। अब दरख्तों और पहाड़ों की सुंदरता की जगह कम्युनिस्ट पार्टी के कामरेडों के स्मारकों ने मेरा ध्यान खींच लिया जो नेशनल हाईवे के किनारे पर बनाए गए हैं। मैं जब-जब इन स्मारकों को देखता हूं तो नक्सलियों के बारे में सोचने लगता हूं। झीरम गांव कई पारा या टोलों का समूह है। कम से कम तीन टोले तो हाईवे पर ही हैं। यही वह जगह है जहां पर बहुत से बेगुनाह लोग भी नक्सलियों की सनक के शिकार हुए थे। मैं जब-जब झीरम से गुजरता हूं तब-तब कोरकोट्टी-मदनवाड़ा की कसक गहरी हो जाती है जिसमें हमने अपने बेहतरीन कप्तान श्री विनोद चौबे को खो दिया था। यह बहुत बड़ी विभागीय क्षति थी। और जब-जब कोरकोट्टी-मदनवाड़ा की घटना को याद करता हूं तो मुझे झीरम हत्याकांड की भी दुखद याद ताजी हो जाती है। कभी-कभी लगता है कि झीरम कांड(25 मई, 2013) और कोरकोट्टी-मदनवाड़ा कांड(12 जुलाई,2009) एक ही दुखान्त नाटक के दो एपीसोड हैं, हालांकि कि दोनों में देश और काल का लंबा अंतराल है।
21/06/2019

जाति-व्यवस्था

जातिवाद को मैं भारतीय समाज का कलंक मानता हूं। जाति व्यवस्था जन्म के आधार पर भेदभाव का पोषण करती है तथा समाज के कुछ समूहों को बहुत से अधिकारों और सुविधाओं से वंचित रखती है। अगर हिंदुस्तान में जो चीजें या चलन संविधान की मूल भावनाओं के खिलाफ हैं तो उनमें जातिवाद सबसे आगे है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समानता तथा स्वतंत्रता और अवसर की समता हमारे संविधान के बुनियादी ढांचे की कुछ मुख्य विशेषताएं हैं। जाति व्यवस्था हमारे संविधान की इसी मूल भावना के ठीक विपरीत है। सरल शब्दों में कहें तो जातिप्रथा संविधान के ही खिलाफ है। यह अत्यंत शर्म की बात है कि इसे हम आज भी बर्दाश्त कर रहे हैं, ढो रहे हैं। वैसे अन्य अनेक बातें हैं जिन्हें सभ्य समाज बर्दाश्त नहीं कर सकता लेकिन जातिप्रथा सबसे अधिक खतरनाक है। जब देश का बहुसंख्यक समुदाय हिंदू ही हजारों टुकड़ों में खंडित है तब फिर हम अव्वल दर्जे की कौमी एकता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
        अब ऐसी बातों का समर्थन करने का दौर नहीं रहा। इसे जड़ से उखाड़ना न केवल जरूरी है बल्कि संभव भी है।
      तुर्की के जननायक अतातुर्क कमाल पाशा ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद की परिस्थितियों में अपने देश में व्याप्त दकियानूसी सोच और सभी तरह के कठमुल्लापन को समाप्त कर दिया था। इससे कुछ वर्गों को तकलीफ़ जरूर हुई लेकिन इतिहास में कभी  'यूरोप का मरीज' के नाम से कुख्यात तुर्की आज समृद्ध राष्ट्र है। हमें भी किसी 'युवा तुर्क' का इंतजार है जो देश से घिनौनी सामाजिक बुराइयों को एक झटके में खत्म करने का 'कमाल' कर सके।

डिस्क्लेमर :- कृपया राजनीति प्रेरित टिप्पणी करने से बचें।
27/05/19

नूरा कुश्ती

बारिश कम होती है,
नदी-नालों में उफान ज्यादा होता है।
असल मुद्दे सब गायब हैं;
फालतू बातों पर तूफान ज्यादा होता है।।

हर जगह चलती है नूरा-कुश्ती
दिखावे का घमासान ज्यादा होता है।।

जनहित में कुछ खास कर पाते नहीं,
उल्टा-पुल्टा बयान ज्यादा होता है।।

सहमी-सकुचाई सी रहती है शराफ़त,
शरारत को गुमान ज्यादा होता है।।

बारिश कम होती है,
नदी-नालों में उफान ज्यादा होता है।
असल मुद्दे सब गायब हैं;
फालतू बातों पर तूफान ज्यादा होता है।।
       
                      - किशोरीलाल वर्मा 'कुन्दन'
                             07/07/2019
                               ग्राम - छीपा
                               राजनांदगांव

© सर्वाधिकार सुरक्षित।

बुधवार, 12 जून 2019

पड़ चुका हूं ऐसे-ऐसों के चक्कर में

पड़ चुका हूं ऐसे-ऐसों के चक्कर में।
कुत्ते गधे भी नहीं ठहरते जिनकी टक्कर में।।

अपनी तारीफ़ खुद करके बनते हैं मियां मिट्ठू।
पीठ पर लादे फिरते हैं जलनखोरी के पिट्ठू।।

औरों की क्षमता से जलते रहते हैं रात-दिन।
बद-तमीजी की रायफल पर चढ़ाए रहते कमीनेपन की संगीन।।

जब तब टांग अड़ा कर हासिल कर लेते हैं सरप्राइज।
काली करतूतों की कालिख से करते हैं केमोप्लाइज।।

            -  किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'
                   पी. टी. एस.,माना
                         2001

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बुधवार, 5 जून 2019

ये जो तेरे चेहरे पे मुस्कान है

ये जो तेरे चेहरे पे मुस्कान है।
मेरी खुशनसीबी की पहचान है।।

तेरी एक मुस्कराहट पर 
हजारों खुशियां कुर्बान हैं।।

तू ही मेरी दौलत है
तुझ पर ही गुमान है।।

तुम्हीं से रौशन मेरी दुनिया
तू ही मेरी जान है।।

अब उतर मेरे कंधे से
देखना तुझे सारा जहान है।।

दुनिया छोटी है और तेरा कद ऊंचा
ये साबित करना मेरा भी इम्तिहान है।।

ये जो तेरे चेहरे पे मुस्कान है।
मेरी खुशनसीबी की पहचान है।।

                     - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

04/06/2019
राजनांदगांव
© सर्वाधिकार सुरक्षित

सोमवार, 3 जून 2019

हिस्सेदारी नहीं भागीदारी चाहिए

केवल अधिकारों की हिस्सेदारी नहीं
कर्त्तव्यों में भी भागीदारी होनी चाहिए।
सिर्फ कौम की क्यों सोचें,
वतन के लिए भी जिम्मेदारी होनी चाहिए।।
बड़े कष्टों के बाद मिली है आजादी,
इसे सहेजने की समझदारी होनी चाहिए।।
अपनों से मुहब्बत ही ठीक है यारों
दुश्मनों के लिए दिलों में चिन्गारी होनी चाहिए।।
वतन पर मर मिटने वालों की जज़्बात समझ सकें
इतनी सी तो दिलदारी होनी चाहिए।।
केवल अधिकारों की हिस्सेदारी नहीं
कर्त्तव्यों में भी भागीदारी होनी चाहिए।।

                      - किशोरी लाल वर्मा 'कुन्दन'

दिनांक 03/06/2019
राजनांदगांव
©सर्वाधिकार सुरक्षित

रविवार, 3 मार्च 2019

सलवा जुडूम का सच

सलवा जुडूम का सच

मई 2005 में कुटरू-फरसेगढ़ से एक जन आंदोलन शुरू हुआ जिसे सलवा जुड़ूम नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम का अर्थ है शांति के लिए संगठन या शांति के लिए युद्ध।पहली नजर में यह नक्सलियों के खिलाफ बस्तर के आदिवासियों का सशस्त्र युद्ध था।तीर-कमान,कुल्हाड़ी आदि से लैस ये आदिवासी नक्सलियों तथा उनके समर्थकों के सफाये में लग गए।बस्तर के आदिवासियों ने वहाँ की या अपनी सुरक्षा स्वयं अपने हाथ में ले लिया।वे बस्तर के चप्पे चप्पे में लोगों और सामानों की आवाजाही पर नजर रखने लगे ताकि नक्सलियों की सप्लाई लाईन को काटा जा सके।बस्तर के आदिवासी खुदमुख्तार होने लगे थे।
                      1910 में बस्तर के आदिवासियों ने महान स्थानीय लड़ाका गुंडाधूर के नेतृत्व में अँगरेजों के बनाए व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था।जिसे भूमकाल नाम दिया गया।सलवा जुड़ूम अपने सही अंजाम पर पहुँचता तो भूमकाल से भी महान होता।
                     तमाम कमियों,अभावों और कष्टों के बावजूद सलवा जुड़ूम सफलता की ओर अग्रसर था।दरअसल बस्तर में अब तक जो भी बाहरी लोग आए ,लगभग सभी ने आदिवासियों की सरलता का गलत फायदा उठाया।चाहे वे अन्नम देव के समय से बस्तर में वर्चस्व जमाये तेलगु भाषी हों, अँगरेजों के नुमाइंदें हों या गुड़ नमक के बदले बहुमूल्य वनोपज छीन लेने वाले व्यापारी हों,चाहे बांग्लादेशी शरणार्थी हों,चाहे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी हों या चाहे भारत के अन्य भागों में अपराध करके बस्तर के बीहड़ जंगलों में छिपे पापी और उनकी संतानें हों और चाहे नक्सली ही हों।सबने बस्तर और बस्तरिहों को दोनों हाथों से लूटा। सबने उनकी सिधाई का लाभ उठाया।
                 सलवा जुड़ूम के समय भी बस्तर के आदिवासी छले गए।बस्तर के आदिवासियों का इस प्रकार जागरूक होना किसी को भी रास नहीं आया। बस्तर के आदिवासी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा कर इस आंदोलन को संगठित किया था।आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होंने अपना जंगल,जमीन सब कुछ हार कर सलवा जुड़ूम कैम्पों में रहने लगे थे।साधन हीन सुविधा हीन इन लोगों का किसी भी सामाजिक संगठन या सामाजिक वर्ग ने सहयोग नहीं किया।अलबत्ता जब 8अक्टूबर 2005 को अफगानिस्तान में भूकंप आया तो पूरे भारत से और छत्तीसगढ़ से भी सहायता सामग्री अफगानिस्तान भेजी गयी परंतु इन वनवासियों का किसी ने ख्याल नहीं रखा।केवल शासन ने देखभाल किया। बाकी सब तो दुःखी थे,भयभीत थे।उनके पैरों के नीचे की जमीन खिसकती नजर आ रही थी। अगर उन्हें अपने स्वार्थ सिद्ध करते रहना था तो उनके हिसाब से सलवा जुड़ूम का विफल होना जरूरी था।सबसे पहले महेन्द्र कर्मा ने सलवा जुड़ूम को अपने हाथों में लिया।बस्तर में उनकी अगुवाई या सहभागिता के बिना कोई जन आंदोलन हो उन्हें कैसे मंजूर होता।सोढ़ी देवा नामक काल्पनिक व्यक्ति को सलवा जुड़ूम का सुप्रीम कमांडर बताया।यदि कोई वास्तविक व्यक्ति जुड़ूम का कमांडर इन चीफ होता तो बस्तर के नेताओं की वाट लग जाती।तुरंत आनन फानन में पक्ष विपक्ष एक होकर सलवा जुड़ूम जैसे जन आंदोलन को हथिया लिया।अब जुड़ूम को राजनेताओं की दया,शासन की नीतियों और कोर्ट के निर्णयों पर निर्भर कर दिया गया।एक बहुत बड़े जन आंदोलन की धार को असर दिखाने से पहले ही कुंद कर दिया गया।फिर न्यायालय का निर्णय आया कि आम जनता के किसी भी भाग का सशस्त्रीकरण नहीं किया जा सकता।इस तरह जुड़ूम को समाप्त कर दिया गया।आज बस्तर की जनता 2005से भी बदतर हालात में है। कुछ राजनीतिज्ञ खुद के बनाये चक्रव्यूह में फंस कर समाप्त भी हो गये लेकिन बहुत से लोगों की दुकानें अब भी बस्तर में नक्सली आतंक के कारण बदस्तूर चल रही है।